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स्पेशल स्टोरी : यूपी में बीजेपी क्यों 33 पर सिमट गई ? अफसरशाही को छूट और बूथ कमेटी की उपेक्षा पड़ी भारी

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विनोद शर्मा

नोएडा, 15 जून।

यूपी में बीजेपी को लोकसभा चुनाव में सिर्फ 33 सीट मिलने के बाद से पूरे देश मे राजनीतिक चर्चा जोरों पर है। इसकी वजह यह है कि 2019 में बीजेपी को पूरे देश मे 303 सीट मिली थी जो 2024 में घटकर 240 रह गई। यानी कुल 63 सीट कम मिली। इनमे भी लगभग 30 सीट यूपी में बीजेपी हारी है। अब इस बात पर बीजेपी नेतृत्व में माथा पच्ची चल रही है।

डबल इंजन सरकार की कई योजनाएं क्या लाभार्थी तक पहुंची

राजनीतिक गलियारों से मिली जानकारी के अनुसार यूपी में योगी के नेतृत्व में सरकार 2017 से लगातार चल रही है। केंद्र में 2014 से बीजेपी की सरकार है। डबल इंजन की सरकार के बावजूद बीजेपी की घटती ताकत राजनीतिक विश्लेषकों का बीच सबसे बड़ी बहस का मुद्दा है। 2024 में पूरा चुनाव मोदी और योगी के चेहरे पर लड़ा गया। केंद्र सरकार की 80 करोड़ लोगों के लिए मुफ्त राशन योजना, आयुष्मान कार्ड , घर घर नल, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना का लाभ कैसे सही लोगों तक पहुंच रहा है। इस पर अब चर्चा हो रही है।

इसी तरह योगी सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में जैसे काम किया है उससे भी लोग लाभान्वित हुए हैं। कानून व्यवस्था का मुद्दे पर योगी ने वोट मांगे। जैसे माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई योगी ने की है। उसकी भी जनता ने कई बार तारीफ की। इसके बावजूद ऐसा क्या हुआ जो यूपी की जनता का एकाएक बीजेपी से मोह भंग हो गया।

बूथ कमेटी के साथ प्रत्याशियों की संवादहीनता

चुनाव प्रक्रिया में लगे बीजेपी के नेताओं से मिली जानकारी के अनुसार बीजेपी में बरसों से बूथ स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों द्वारा नजर अंदाज करना यूपी में बीजेपी के घटते जनाधार का सबसे बड़ा कारण है। प्रत्याशी मोदी- योगी के 400 पार के नारे व दोनो नेताओं के आभामंडल के सामने इतने आत्मविश्वास में भर गए कि उन्होंने बूथ कमेटी के अध्यक्षों के साथ संवाद व सम्पर्क ही नही किया। इसकी वजह से बीजेपी के पन्ना प्रमुख व्यवस्था ध्वस्त हो गई। बूथ कमेटी के सदस्य संवादहीनता की वजह से घर घर वोट मांगने नही गए।

अफसरों की मनमानी पर कोई अंकुश नही

योगी सरकार में प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी से कार्यकर्ता भी नाराज नजर आए। अफसरों ने योजनाओं का फायदा जिन्हें चाहा उन्हें दिया। पार्टी के कार्यकर्ताओं को ऐसे मामलों में तवज्जो नही मिली। कई लोकसभा क्षेत्रों में मौजूदा सांसद प्रत्याशी व 2022 के चुनाव में मात खाए पूर्व विधायकों के बीच टकराव इतना बढ़ गया इसमे बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा। इसमे सबसे बड़ा उदाहरण संजीव बालियान व संगीत सोम के बीच चली आ रही प्रतिद्वंदिता का है। जिसमे संगठन मूकदर्शक बना रहा और परिणाम मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट बीजेपी हार गई। लोनी के विधायक नन्द किशोर गुर्जर ने कई बार गाजियाबाद के प्रशासनिक अधिकारियों पर तानाशाही के आरोप लगाए। शासन स्तर से कोई हस्तक्षेप नही हुआ। गौतमबुद्ध नगर जिले में किसान आंदोलन के दौरान सरकार की तरफ से एक उच्च स्तरीय कमेटी का नोटिफिकेशन जारी हुआ था जिसमे सांसद व अफसरों को शामिल किया गया था। इस पर आंदोलन स्थगित हो गया था। बाद में अफसरों ने ऐसी कमेटी के गठन को रद्द कर दिया। किसान आंदोलन के दौरान नोएडा के विधायक पंकज सिंह ने किसानों के बीच जोरदार तरीके से लखनऊ में बैठे उन अफसरों के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए थे जो आंदोलन के बावजूद किसानों की बात सुनने को तैयार नही थे। इसी तरह एक अपार्टमेंट में हुई अराजकता के मामले में सांसद डॉ महेश शर्मा ने फोन पर प्रदेश के गृह सचिव के सामने अपनी बात कही थी कि मुझे यह कहते शर्म आती है कि प्रदेश में हमारी सरकार है।

दलबदलुओं की घुसपैठ से बीजेपी कार्यकर्ता हुए निराश

बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि 2014 के बाद से बीजेपी का चेहरा हर स्तर पर बदलने लगा। हर माफिया अपने गुनाह से बचने को बीजेपी में शामिल होने लगे। हालत यह हुई है कि 2017 के पहले योगी मंत्रिमंडल में 11 ऐसे मंत्री बने जो बसपा व सपा सरकार में भी मंत्री थे। इनमे स्वामी प्रसाद मौर्य सबसे बड़ा उदाहरण है। 2022 में जब योगी की दूसरी बार सरकार बनी तो 22 मंत्री ऐसे बने जो दूसरे दलों से आये थे। 2024 में भी चुनाव में कई ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी गई जो दूसरी पार्टी से आये थे। इनमे जितिन प्रसाद कांग्रेस से आये पहले योगी सरकार में मंत्री बने। वरुण गांधी की जगह पीलीभीत से चुनाव लड़ाया और अब केंद्र में मोदी सरकार में ब्राह्मण कोटे से मंत्री बने हैं। इसी तरह जोन पुर से कांग्रेस से आए  कृपाशंकर को प्रत्याशी बनाया। वह चुनाव में हार गए उन्होंने बीजेपी नेताओं पर हार का ठीकरा फोड़ दिया। विपक्ष ने भी चुनाव से पहले ही यह बात जनता तक पहुंचा दी कि बीजेपी मुस्लिम विरोधी के साथ साथ किसान विरोधी, जाट विरोधी व ठाकुर विरोधी है। इसका असर पहले चरण से लेकर आखिरी चरण तक यूपी में नजर आया। अब आरएसएस के साथ मतभेद की बात सामने आ रही है। मोहन भागवत के बयान से यह विवाद बढ़ता जा रहा है। सवाल तो यही है कि यूपी में बीजेपी के संगठन में समन्वय की कमी से प्रदेश में पार्टी की हालत खराब हुई।

Noidakhabar.com के लिये स्पेशल रिपोर्ट

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक व नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता रहे हैं।)

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