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एक कविता -महायुद्ध के बीच अबोध बालक और मां

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महायुद्ध के बीच अबोध बालक और मां

यूक्रेन की सीमा पर माँ के साथ
एक नन्हा फ़रिश्ता जोड़े हुए हाथ
माँ से पूछा सवाल
क्यों हो रहा यह बवाल
लेकर केवल जिस्म अवशेष
कहाँ जाएँगे छोड़ कर अपना देश ?

माँ हों गयी मौन
किंतु न बोलती तो बोलता कौन
माँ ने कहाँ बेटे यह वर्चस्व की लड़ाई है
हम कमजोर हैं ,हमारी शामत आयी है

ज़िद ,दबंगई,घमंड,शक्ति प्रदर्शन के लिए है यह सब
हम आम नागरिक से किसी को क्या मतलब
इसलिए हम कहीं और शरण में जा रहें हैं
भूखे,प्यासे भागकर अभी जान बचा रहे हैं

वैसे तो पूरी दुनिया की नज़र हमारे देश पर है
महाशक्ति बनने की रेस पर है ,इस महा क्लेश पर है
कोई बंदूक़ भेज रहा ,कोई गोलियाँ
कोई बारूद भेज रहा कोई सैन्य टोलियाँ

मगर कोई नहीं चाहता हमारा चमन सुरक्षित रहे
कोई सोचता ही नहीं कैसे हमारा भवन सुरक्षित रहे
हम बेघर हैं,भूखे हैं ,प्यासे हैं ,बीमार हैं
रोटी,पानी और दवा को लाचार हैं
माँ बेटे की आँखों से आँसू निकल रहे थे
हाथ पकड़ दोनों तेज-तेज रेफ़्यूजी कैम्प की ओर चल रहे थे

बच्चे की मासूम सवाल और माँ के जवाब पर
हम भी हैं मौन
युद्ध का ज़िम्मेदार है कौन
काश मानवता की इस भीषण तबाही पर सिहरता
काश कोई युद्ध को रोकने की पहल करता

विनोद शर्मा की कलम से मानवता को समर्पित एक रचना

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