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उत्तर प्रदेश में फाँसी की एक घटना पर बेबाक कहानी, आप पढ़े बिना नही रह पाएंगे-1

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आंखों देखी दास्तान-1

“ Hang till death “ वह एक ऐसा वाक्य है जिसके सुनते हम में से 99% लोगों के दिमाग़ में फ़िल्मों में देखा गया एक अदालत कक्ष ,उसमें डायस पर बैठे एक भारी भरकम व्यक्तित्व के जज साहब, सामने खड़े बैठे वकील साहबान ,कुछ पुलिस वाले ,कुर्सियों पर बैठे दर्शक गण और कटघरे में काँपता मुलज़िम, यही खाका नज़र आने लगता है जिसमें जज साहब फ़ैसला सुना कर कलम तोड़ देते हैं और हम सब के लिये hang till death की परिकल्पना पूरी हो जाती है । हा कुछ देशभक्ति वाली फ़िल्मों में फाँसी का फन्दा ,काला मुंह ढकने का कपड़ा और जल्लाद नाम को सार्थक करता एक भयावना व्यक्ति और जोकरनुमा जेलर साहब भी इस प्रक्रिया में जुड़ जाते हैं पर क्या सचमुच यही इस वाक्य का पूरा विस्तार है ? नहीं शायद बिल्कुल नहीं ! वास्तव में अदालत के फ़ैसले से लेकर फाँसी के फन्दे तक पहुँचाने की एक पूरी त्रासद प्रक्रिया है जिसमें होकर फाँसी की सजा पाये अभियुक्त के अलावा इस प्रक्रिया को वहाँ तक पहुँचाने वाला पूरा का पूरा जेल प्रशासन भी भुगतता व अनुभव करता है। उस त्रासदी का एहसास केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो स्वयं ही उस प्रक्रिया का हिस्सा रहा हो । प्रक्रिया के पूरा होने तक का सही सलामत कर्तव्य पालन का भाव व चिन्ता और प्रक्रिया समाप्त हो जाने के बाद उत्पन्न होने वाले दुखद ग्लानि बोध को गूँगे के गुड़ के स्वाद की भाँति केवल भुगतने वाला ही समझ सकता है।संयोग या दुर्योगवश अपनी अल्प क़ालीन जेल सेवा में मुझे दो बार इस त्रासद प्रक्रिया व अनुभव से गुजरना पड़ा ।काफ़ी दिनों से मैं इस पर लिखना चाह रहा था पर संकोच हो रहा था कि यह कौन सा ऐसा सुखद अहसास है जो लोगों को शेयर किया जाये पर पिछले दिनों हमारे मित्रवत् सेन्ट्रल जेल नैनी की जेल सेवा में सहयोगी रहे सेवानिवृत्त जेल अधीक्षक श्री ललित मोहन पाण्डेय जो रिश्तेदार भी हैं द्वारा लिखी गई , इसी में से एक घटना पर आधारित कहानी उनके कथा संग्रह में पढ़ने के बाद मेरी भी इच्छा हुई कि समाज की दृष्टि से दूर , छिपे हुये , इस द्विविध अनुभव जो जुडिशियल एडमिनिस्ट्रेशन को पूर्णता तक पहुँचाता है , से लोगों का परिचय कराया जाये । सो यह धृष्टता कर डाली है ताकि समाज भी यह जाने कि जेल कर्मियों को कितने मानसिक दबावो व तनावों से गुजर कर न्यायिक प्रशासन की इस प्रक्रिया को पूर्णता तक पहुँचाना पड़ता है ।
मेरी पहली फाँसी के विवरण के पूर्व फाँसी की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट कर देने पर घटनाक्रम समझने में आसानी होगी । वास्तव में जेल में हर समय कई फाँसी की सजा पाये बन्दी गण रहते हैं जिनके प्रकरण उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय , रिव्यू ,रिवीज़न क्षमादान सजामाफी जैसे प्रक्रमों पर लम्बित रहते हैं और ऐसे बन्दियों को अन्य बन्दियों से अलग जेल की भाषा में तन्हाई बैरक में रखा जाता है जहां वह पृथक रहते हुये विशेष रूप से बनी गोल तन्हाई सेलों में अलग अलग रहते हुये प्राय: कुछ विशिष्ट प्रतिबंधो के साथ सामान्य बन्दी जीवन जीते हैं पर फाँसी का अन्तिम आदेश जिसे अदालती बोलचाल में ब्लैक वारन्ट कहा जाता है तथा जिसमें फाँसी देने का दिन तारीख़ व वक्त मुक़र्रर रहता है मिलते ही उन्हें सबसे अलग रखते हुये उस त्रासदायक प्रक्रिया की शुरुआत हो जाती है जिससे सजायाफ्ता बन्दी के साथ ही सम्बंधित जेल प्रशासन को भी गुजरना पड़ता है।

अब बात उस अजीबोग़रीब अनुभव की जिसने नौकरी के शुरुआती दिनों में ही मन ,शरीर व आत्मा तक को हिला कर रख दिया था । बात वर्ष 1985 की है महीना तारीख़ याद नहीं जेल में फाँसी की सजा पाकर बन्द श्री अमुक जो पूर्वांचल के जौनपुर ज़िले के रहने वाले ब्राह्मण जाति के व पेशे से अध्यापक रहे थे के परिजनों की सजा माफ़ या कम कराने की सारी कोशिशें ख़त्म होने के बाद उन्हें अन्तिम रूप से फाँसी दिये जाने का अदालती निर्णय होकर सम्बन्धित न्यायालय द्वारा ब्लैक / डेथ वारन्ट निर्गत हो गया । नैनी जेल में उक्त वारन्ट के प्राप्त होते ही जैसे मानों प्रशासनिक हलचल ही मच गई गोपनीय रूप से फाँसी की पूरी तैयारी कुछ इस तरह शुरु हो गई मानों कोई आयोजन प्रस्तावित हो ।साथ ही पूरा ध्यान इस बात का रखा जा रहा था कि सामान्य बन्दियों का इस का पता भी न चले।केवल कुछ अति विश्वसनीय पक्के व नम्बरदारों को इस काम में शामिल किया गया । अपर कारागार अधीक्षक होने के कारण पूरी तैयारी कराना वह भी पूरी तरह से गोपनीय रखते हुये मेरा ही दायित्व था ।
सबसे पहले वीरान व उपेक्षित पड़े हुये फाँसी घर के हाते व बैरक की सफ़ाई ,फाँसी के तख्ते की रंगाई पुताई व फाँसी के तख्ते के ज्वाइन्टस , लीवर ,गेयर ,हैण्डल में लुब्रीकेन्ट डाल कर उसकी स्मूथ हैण्डलिंग सुनिश्चित कराने का कार्य पूरी गोपनीयता के साथ शुरु कर दिया गया। फांसी के अहाते को गोपनीयता व सुरक्षा की दृष्टि से जेल के बाहरी कोने पर बिल्कुल अलग से बनाया जाता है जिससे वहाँ होने वाली गतिविधियों का असर जेल की सामान्य व दैनिक कार्यप्रणाली पर न पड़े !नैनी जेल का फांसीघर भी इस दृष्टि से पूरी तरह अलग व सुरक्षित था अत: बिना किसी बाधा या अवरोध के तैयारी के यह प्रक्रिया चलती रही ।
दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु था फाँसी देने वाली रस्सी का प्रबन्ध ,इस सम्बन्ध में जानकारी करने पर एक मिट्टी के पात्र में सुरक्षित रखी गई अलग तरह की रस्सी लाई गई जिसमें मोम लिपटा हुमा था । पता चला कि फाँसी देने वाली ख़ास तरह की रस्सी कलकत्ता में मिलती है ,तभी किसी नें बताया कि अब बिहार की बक्सर जेल में फाँसी देने वाली ख़ास तरह की रस्सी बनाई जाती हैं और सभी जेलों में वही से आपूर्ति होती है।बक्सर की रस्सी बनाने में एक विशेष तरह के रेशों से तैयार की जाती है और उसे मोम में डुबा कर रखा जाता है ताकि उसकी मुलायमियत बनी रहे व फाँसी के समय कम से कम तकलीफ़ हो। तुरन्त एक विशेष वाहक बक्सर भेजा गया तथा वहाँ से विशेष प्रकार की नई रस्सी मंगाने का प्रबन्ध किया गया ।
तीसरा सबसे प्रमुख प्रबन्ध जल्लाद का इन्तज़ाम था ,जल्लाद का आवंटन कारागार मुख्यालय द्वारा ही किया जाता था ।कारागार मुख्यालय द्वारा मेरठ जेल के जल्लाद संभवत: कल्लू नामक को इस कार्य हेतु नियत कर इसकी सूचना भेज दी गई । नियमानुसार नैनी से एक स्पेशल सशस्त्र गार्द मेरठ रवाना की गई जो मेरठ से उक्त जल्लाद को अपनी सुरक्षित अभिरक्षा में लेकर नैनी आये ,जहां जेल के अन्दर ही उसके रहने खानेपीने की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जानी थी।सम्बन्धित पुराने अधिकारियों द्वारा बताया गया कि आवन्टन के बाद फाँसी होने तक जल्लाद की सुरक्षा अत्यन्त संवेदनशील व महत्वपूर्ण हो जाती है तथा आवंटित जेल के द्वारा उसकी पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।नियत समय के तीन दिन पूर्व ही कल्लू नैनी आ गया तथा उसने फाँसी के प्लेटफ़ार्म ,गियर ,हैण्डल नट बोल्ट फाँसी की रस्सी ,फासीघर आदि सब कुछ सब चेक करना शुरू कर दिया था।कुल मिला कर तीन दिन पूर्व ही सारी अपेक्षित तैयारियां पूरी हो चुकी थीं और इस कार्य के महत्व ,संवेदनशीलता को देखते हुये हम सभी की साँसें ऊपर नीचे हो रखीं थीं और हमें से हर कोई बिना मामले के भावनात्मक पहलू को सोचे कार्य के समय से व सकुशल सम्पन्न हो जाने की प्रार्थना कर रहा था ,शायद हम में से किसी के दिमाग़ में यह बिन्दु था ही नहीं कि हम एक जीवन समाप्त करने की तैयारियों में जुटे थे। नियमानुसार मैजिस्ट्रेट के रूप में एडीएम सिटी स्व श्री एल बी तिवारी की ड्यूटी लग गई थी डाक्टर के तौर पर जेल अस्पताल के मेडिकल सुपरिन्टन्डेन्ट व उनकी टीम थी ही । सारी तैयारियों की सूक्ष्म समीक्षा तत्कालीन वरिष्ठ जेल अधीक्षक स्व श्री राधेश्याम त्रिपाठी द्वारा की जा रही थी ।कुल मिलाकर जेल प्रशासन अपनी तरफ़ से पूरी तरह तैयार था बस प्रतीक्षा नियत तिथि व समय की थी ।

तैयारी पूरी होने के बाद फाँसी सम्पन्न होने ,उस दौरान घटी घटनाओं व उसके बाद हुई आन्तरिक प्रतिक्रिया ,अपराध बोध व कुछ अन्य बिन्दुओं पर कथा अगले चरण में तब तक हेतु शुभरात्रि

(रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी आर के चतुर्वेदी जी की फेसबुक वॉल से)

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