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मिशन यूपी के जरिये क्या मायावती अपनी राजनीतिक विरासत बचा पाएंगी ?

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-मायावती का राजनीतिक चरम क्या आना बाकी है

-दलित वोट बैंक पर कई दलों की नजर

-अकाली दल के किसान के बाद माया ने नीतीश का पिछड़ी जाति की जनगणना पर साथ दिया

-2024 की जमीन अभी से तैयार कर रही मायावती

नई दिल्ली, यूपी में 2022 विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई हैं। यूपी से बसपा को जोडकर देखा जाता है इसकी वजह है कि देश भर में उत्तर प्रदेश एकमात्र ऐसा प्रदेश रहा है जिसमें बसपा की सरकार कई बार रही है। अब 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद बसपा लोकसभा चुनाव में उभरी। राजनीतिक समीकरण इस तरह से बन बिगड रहे हैं कि लोगों को लगने लगा है कि बसपा अब शायद उभर पाए मगर सामाजिक समीकरण जोडने में माहिर मायावती क्या करिश्मा दिखा दे कुछ कहा नहीं जा सकता। इस बार बसपा यूपी के साथ ही पंजाब में भी अकालीदल के साथ मिलकर फिर से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में लगी है। हाल ही में पिछडी जातियों की जनगणना कराने के मुद्दे पर मायावती बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के साथ खड़ी नजर आ रही है। यह राजनीतिक बदलाव क्या बसपा को राजनीतिक बढ़त दे सकेगा और इसे 2024 के चुनावों से भी जोड़कर देखा जा रहा है।इस पर अब राजनीतिक पंडित बहस में लगे हुए हैं।
बसपा का क्या है राजनीतिक सफर
बसपा का राजनीतिक सफर वैसे तो 1984 में बसपा के  संस्थापक कांशीराम से शुरू हो गया था। मायावती ने राजनीति में उतरने के पहले कैराना, बिजनौर, हरिद्वार, में उतरकर जातिगत समीकरण की थाह ली। 1989 में पहली बार बसपा को देश भर में चार सीट मिली। उस समय बसपा 245 लोकसभा सीट पर लडी थी। तब बिजनौर से मायावती जीतकर पहली बार लोकसभा में पहुची। 1989 से लेकर 2019 तक के लोकसभा चुनावों में बसपा का चरम वर्ष 2009 में था जब बसपा ने 21लोकसभा सीट जीती थी। तब यूपी से 20 और मध्यप्रदेश से एक सीट मिली मगर औवरआल वोट 6.17 प्रतिशत मिला था। वैसे 2014  में बसपा को वोट तो 4.19 प्रतिशत मिले मगर कोई भी सीट नहीं जीत पाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ लडकर वोट तो 3.19 प्रतिशत मिले मगर 10 लोकसभा सीट जीत ली।
यूपी विधानसभा में बसपा का चरम 2007 में था
बसपा ने यूपी में 1993 से अपना राजनीतिक सफर शुरु किया। 164 सीटों पर लडी और 67 सीट जीती। 1996 में 296 सीटों पर लडी मगर सीट 67 ही जीती। बसपा ने तब मुलायम व कल्याण सिंह के साथ मिलकर अलग-अलग समय सरकार बनाई। बसपा ने 2002 में 98 सीट जीती।, 2007 में 206 सीट जीती और पहली बार अपने बूते सरकार बनाई।  2012 में बसपा को सिर्फ 80 सीट ही मिली। तब बीजेपी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी। 2017के विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ 19 सीट ही मिली। वह अब 2022 में अपने लिए फिर से राजनीतिक जमीन को मजबूती से तलाश कर रही है।
मायावती के वोट बैंक पर है सबकी नजर
बसपा प्रमुख मायावती 18 सितंबर 2003 को पहली बार पार्टी की अध्यक्ष बनी। तब से लेकर अब उनका चौथा कार्यकाल चल रहा है। उनके सामने अग्नि परीक्षा की घडी है.क्या वे यूपी में जातीय समीकरण का संतुलन बैठा पाएंगी। ब्राहमणों को रिझाने के लिए मायावती ने सतीश चंद्र मिश्रा को ब्राहमण सम्मेलन की जिम्मेदारी दी है। वह किसानों के मुद्दे पर अकाली दल के साथ है। मुस्लिम को अपने पाले में लाने को दानिश  को लगाया है। पिछडों का साथ पाने को बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के साथ पिछडी जाति की जनगणना पर जुट गई है। संकेत भी दिया है कि यदि बीजेपी ऐसा करती है तो वह बीजेपी के साथ है। इससे यह संकेत मिलता है कि पिछडी जाति की जनगणना केे मुद्दे पर क्या उनकी बीजेपी के नेताओं के साथ कोई चर्चा हुई है। विपक्ष के तीखे तेवरों में वह कांग्रेस से अलग हैं। मायवती को ममता से भी कोई लेना देना नहीं है। ऐसे समय में 2022 के चुनाव में मायावती क्या अपने बूते इतने वोट ले आएंगी कि वह अपनी सरकार बना सके या केंद्र के साथ आने वाले दिनों में कोई खिचड़ी पक रही है। ऐसा भी राजनीतिक पंडित मानते हैं। फिलहाल मायावती की उम्र का मसला भी है। वे 65 वर्ष की हो चुकी हैं। उनकी विरासत पर कई राजनीतिक दलों ने टकटकी लगा रखी है। चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी सपा व रालोद के साथ मिलकर 2022 के चुनाव लडेगी। बहरहाल यही सवाल बना हुआ है कि क्या मायावती 2022 में अपने राजनीतिक चरम की तरफ बढ़ेगी या उनके वोट बैंक पर नजर रखने वाले अपने मिशन में कामयाब होंगे।
(नोएडा खबर डॉट काम से विनोद शर्मा)

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