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यूक्रेन-रूस युद्ध से – मैंने देखा ऐसा मंजर -एक कविता

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मैंने देखा ऐसा मंजर

अस्पताल में प्रसव पीड़ा से छटपटाती औरत पर गिरता बम देखा

बहता हुआ खून,आँखों में डर,चेहरे पर ग़म देखा

तसल्ली देते डॉक्टर और बच्चे के लिए मां के बिलखते जज़्बात को देखा

बम बारूद के शोर से गर्भ में दम तोड़ते अजन्मे नवजात को देखा

खिड़की से बाहर खड़े मदद को पुकारते बेबस बुजुर्ग को देखा

जलती बिल्डिंग के बीच से उसको बाहर निकालते सैनिक को देखा।

कुछ पल के लिए चर्च के भीतर
एक दूसरे के हाथों में हाथ लिए
सपने सुहाने दिल में साथ-साथ लिए
नव युगल को मुस्कुराते हुए देखा

निगाहें लगी हैं हर इंसान की वहां पर, जहां से निकले शांति और मानवता के लिए प्यार भरा सन्देश,

यही चाहते हैं कि अब ना निकले किसी भी मां की आंख के आंसू,
ना उजड़े किसी की कोख,
दिखें चारों तरफ मुस्कराते बच्चों के चेहरे,
युद्ध नही है समाधान,
अब भी समय है बचा लो इंसान की कीमती जिंदगी को

विनोद शर्मा की कलम से

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