यूपी की राजनीति: यूपी में बिजली पर अखिलेश-ए के शर्मा टकराव: 2027 की चुनावी पिच पर पहली गेंद

 

विनोद शर्मा
नई दिल्ली/लखनऊ, (नोएडा खबर डॉट कॉम)
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए इसे कमजोर बताया। उत्तर प्रदेश ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा ने सोशल मीडिया पर तीखा जवाब देते हुए आंकड़ों के साथ आईना दिखा दिया। यह बहस महज दो नेताओं के बीच की नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव की शुरुआती जंग का संकेत है।

अखिलेश का सवाल और जनता की हकीकत

अखिलेश यादव का आरोप है कि बिजली व्यवस्था खराब हो रही है, खासकर गर्मी के मौसम में। यह मुद्दा आम जनता को सीधे छूता है। बिजली कटौती, महंगाई और रोजमर्रा की परेशानी हर घर में चर्चा का विषय है। लेकिन मंत्री ए.के. शर्मा के जवाब ने तस्वीर को उलट दिया।

मंत्री का जवाब सारगर्भित आंकड़ों में:
2012-17 (सपा शासन) में पीक डिमांड औसतन 13,000 मेगावाट थी, जो अब पिछले चार सालों में 30,000 मेगावाट हो गई है — यानी ढाई गुना बढ़ोतरी।
2017 में 1.80 करोड़ उपभोक्ताओं को बिजली दी जाती थी, अब यह 3.70 करोड़ हो गई है।
1947 से 2017 तक 70 साल में जितने मजरों (बस्तियों) का विद्युतीकरण हुआ, उससे ज्यादा पिछले 8 साल में हुआ।
स्वयं का तापीय उत्पादन 5160 मेगावाट से बढ़कर 9120 मेगावाट हो गया है।
कुल उपलब्ध बिजली 11,803 मेगावाट से बढ़कर 20,038 मेगावाट (2025) हो गई।
ट्रांसमिशन क्षमता 39,000 MVA से बढ़कर 2 लाख MVA (लगभग 6 गुना)।
जर्जर तार और खंभे बड़े पैमाने पर बदले गए। अब लगभग हर गांव-शहर में 18-24 घंटे बिजली पहुंच रही है।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि मांग भले ही बढ़ी हो (जो विकास और बिजली के बढ़ते उपयोग का संकेत है), लेकिन आपूर्ति और बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषण

यह बहस 2027 की चुनावी पिच पर अखिलेश यादव की पहली गेंद है। सपा रणनीति साफ है — विकास के दावों पर सवाल उठाकर “जनता की पीड़ा” का नैरेटिव बनाना। अखिलेश जानते हैं कि बिजली रोजमर्रा का मुद्दा है, इसलिए इसे आसानी से जन-आक्रोश में बदला जा सकता है।दूसरी तरफ, भाजपा और ए.के. शर्मा का जवाब “आंकड़ों से मुंहतोड़ जवाब” की रणनीति है। वे यह साबित करना चाहते हैं कि सपा शासन में बिजली “कुछ चुनिंदा इलाकों” तक सीमित थी, जबकि अब यह व्यापक और निरंतर हो गई है। “आईना दिखाओ” वाली कविता-शैली का जवाब अखिलेश को उनके अपने कार्यकाल की याद दिलाता है।
जनता की नजर में हकीकत:

ग्रामीण क्षेत्रों में पहले बिजली नाम मात्र की थी, अब ज्यादातर जगह 24×7 की दिशा में प्रगति है।
शहरों में भी सुधार हुआ है, हालांकि गर्मी के पीक समय में दबाव बढ़ता है। लेकिन आम आदमी पूछता है — बढ़ी हुई मांग के बावजूद कटौती क्यों? बिल महंगे क्यों?

यहां विकास और अपेक्षाओं के बीच का गैप है। भाजपा सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर जोर दे रही है, जबकि विपक्ष इसे “जन-समस्याओं की अनदेखी” बता रहा है।

आगे क्या?

2027 तक यह मुद्दा और गर्माएगा। अखिलेश यादव इसे लगातार उठाकर “यूपी की बदहाली” का चित्रण करेंगे। वहीं योगी सरकार नए प्रोजेक्ट्स (मेजा और मिर्जापुर की 2400 मेगावाट नई तापीय परियोजनाएं) और उपलब्धियों को हाइलाइट कर “बदलाव” का नैरेटिव बेचेगी।

बिजली सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर मुद्दा नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का प्रतीक है। अखिलेश की पहली बॉल अच्छी थी, लेकिन ए.के. शर्मा ने डिफेंस के साथ काउंटर-अटैक कर दिया। अब देखना यह है कि जनता इन आंकड़ों और अपनी रोजाना बिजली की कहानी में से कौन-सी ज्यादा वजनदार मानती है। 2027 की असली पिच इसी तरह की छोटी-छोटी बहसों से तैयार होगी।

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