ग्रेटर नोएडा, (नोएडा खबर डॉट कॉम)
एक गंभीर हृदय रोगी और वरिष्ठ अधिवक्ता की आपातकालीन यात्रा प्रशासनिक अकर्मण्यता और पुलिस की संवेदनहीनता के कारण अधूरी रह गई। 61 वर्षीय एडवोकेट अजेय कुमार गुप्ता ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखकर मदद मांगी है।
उन्होंने कहा कि सावन की शिवरात्रि बीतने और मार्ग पर एक भी कांवड़िया न होने के बावजूद NH-9 और गंगा एक्सप्रेसवे पर अकारण अवरोध लगाए गए, जिससे उनकी जान जोखिम में पड़ गई।प्रार्थी ने बताया कि आज सुबह ही उनके शरीर से चिकित्सा संबंधी ELR मशीन हटी थी। पारिवारिक आपातकाल में दो परिजनों के गंभीर एक्सीडेंट और एक परिजन के ऑपरेशन के कारण उन्हें तत्काल काशीपुर (उत्तराखंड) पहुंचना अनिवार्य था।
ग्रेटर नोएडा से मुरादाबाद-काशीपुर मार्ग पर हापुड़ के पास पुलिस ने हल्के वाहनों (कार) का रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया। कांवड़ का हवाला देकर रास्ता रोका गया, जबकि कोई कांवड़िया मौजूद नहीं था।मजबूरी में उन्होंने भारी टोल टैक्स चुकाकर गंगा एक्सप्रेसवे का विकल्प चुना। लेकिन गढ़मुक्तेश्वर (गढ़) निकास पर गाड़ी नीचे उतरते ही वहां भी पुलिस ने मार्ग अवरुद्ध कर रखा था। टोल लेने के बाद भी यात्री को बीच रास्ते फंसा दिया गया। कोई ट्रैफिक जाम भी नहीं था।
गढ़मुक्तेश्वर बैरियर पर तैनात पुलिसकर्मी कुर्सियों पर आराम फरमा रहे थे। पीड़ित ने वरिष्ठ नागरिक होने, अधिवक्ता होने, गंभीर हृदय बीमारी और पारिवारिक एक्सीडेंट की आपात स्थिति बताई, फिर भी उनका व्यवहार अत्यंत संवेदनहीन और अकर्मण्य रहा। पुलिस को स्वयं किसी वैकल्पिक मार्ग की जानकारी नहीं थी।
अब वे वापस ग्रेटर नोएडा लौट रहे हैं। गुप्ता ने पूछा—क्या ऐसे विकसित भारत का सपना पूरा होगा? उन्होंने स्पष्ट किया कि यह शिकायत व्यवस्था विरोध में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर पुलिस की तानाशाही और अकर्मण्यता से तंग आकर की जा रही है, जिससे आम शरीफ नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।
उन्होंने कहा कि वे 14 वर्ष की आयु से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), ABVP एवं अधिवक्ता परिषद जैसी राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े रहे हैं।मुख्यमंत्री से प्रार्थना करते हुए उन्होंने मांग की है कि NH-9 और गंगा एक्सप्रेसवे गढ़मुक्तेश्वर निकास पर अकारण लगाए गए मार्ग अवरोध को तुरंत हटवाया जाए। साथ ही आपातकालीन, बीमार और बुजुर्ग यात्रियों के प्रति संवेदनहीनता बरतने वाले तथा ऑन-ड्यूटी कुर्सियों पर आराम फरमाने वाले दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए।एक बीमार और बुजुर्ग वकील की यह बेबसी प्रशासनिक संवेदनहीनता के मानवीय पहलू को उजागर करती है। हृदय रोगी की जान जोखिम में डालने वाले ऐसे अवरोध आम नागरिकों के लिए कितने घातक हो सकते हैं, यह सवाल व्यवस्था पर खड़ा हो गया है।
