नोएडा, (नोएडा खबर डॉट कॉम)
नोएडा के किसी साधारण मोहल्ले में रहने वाली प्रमिला सोरेन, अपने पति चार्ल्स किस्कू की मृत्यु के बाद पिछले बारह साल से अकेले जीवन की गाड़ी खींच रही हैं। उनके चेहरे पर थकान है, आँखों में नींद की कमी है, और दिल में एक ही चिंता है—अपनी 16 साल की बेटी रोज किस्कू और उसके गर्भ में पल रहे शिशु की जान।
रोज अपने पैतृक गाँव पाकुड़, झारखंड में दादी के साथ रह रही थी। वहाँ एक नाबालिग लड़के के साथ संबंध बनने से वह गर्भवती हो गई। जब बात खुलकर सामने आई तो प्रमिला सोरेन बेटी की सेहत और सुरक्षा को लेकर घबरा गईं। 10 अक्टूबर 2026 को वे रोज को नोएडा ले आईं, इस उम्मीद में कि यहाँ बेहतर इलाज और देखभाल मिल सकेगी।रोज अब लगभग 34 हफ्ते की गर्भवती है। गर्भावस्था के पूरे समय में उसे न तो नियमित जाँच मिली, न पर्याप्त पोषण, न जरूरी दवाएँ।
नोएडा में कराई गई शुरुआती ब्लड टेस्ट में भी कुछ परिणाम चिंताजनक आए। डॉक्टरों के मुताबिक ऐसी हालत में माँ और बच्चे दोनों को गंभीर खतरा हो सकता है। हर बीतता दिन उनके लिए और मुश्किल बना रहा है।प्रमिला सोरेन ने जिम्स, ग्रेटर नोएडा में इलाज करवाने की कोशिश की। अस्पताल ने मेडिको-लीगल प्रक्रिया का हवाला देते हुए पुलिस से संपर्क करने को कहा। कासना थाने पहुँचीं तो क्षेत्राधिकार का मामला बताकर थाना फेस-2 भेज दिया गया। वहाँ थाना प्रभारी राघवेंद्र सिंह से मिलने पर भी शिकायत दर्ज कराने में मदद नहीं मिली। उन्हें पुलिस कमिश्नर के दफ्तर से संपर्क करने की सलाह दी गई। फिर से अस्पताल गईं तो कुछ ब्लड टेस्ट हुए, लेकिन जरूरी अल्ट्रासाउंड और समुचित इलाज नहीं हो सका।
एक विधवा माँ होने के नाते प्रमिला सोरेन आर्थिक रूप से भी सीमित हैं। वे किसी कानूनी प्रक्रिया से भागना नहीं चाहतीं। उन्होंने साफ कहा है कि पुलिस, बाल कल्याण समिति, डॉक्टर और प्रशासन जो भी नियम बताएंगे, वे पूरी तरह सहयोग करने को तैयार हैं। उन्हें बस इतना चाहिए कि बेटी को बिना अनावश्यक देरी के प्रसूति संबंधी इलाज मिल जाए, उसकी गरिमा और गोपनीयता बनी रहे, और माँ-बच्चे दोनों की जान बच सके।
गौतमबुद्ध नगर की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह को लिखे अपने पत्र में उन्होंने करबद्ध प्रार्थना की है कि क्षेत्राधिकार के चक्कर में और वक्त न बर्बाद हो, तुरंत शिकायत दर्ज हो, अस्पताल और पुलिस के बीच समन्वय बने, और उनकी नाबालिग बेटी को सुरक्षा मिले।यह सिर्फ एक कागजी शिकायत नहीं है। यह एक माँ की उस बेबसी की आवाज है, जो अकेले अपनी बेटी और आने वाले बच्चे को बचाने के लिए दर-दर भटक रही है। ऐसी स्थिति में समय सबसे कीमती है। देर होने पर जो नुकसान हो सकता है, उसकी भरपाई शायद संभव न हो।
प्रमिला सोरेन जैसी माँएँ अक्सर अपनी आवाज ऊँची नहीं कर पातीं। लेकिन जब एक माँ अपने बच्चे की जान की फरियाद लेकर प्रशासन के दरवाजे पर पहुँचती है, तो उम्मीद यही रहती है कि उसे मानवीय नजरिए से सुना जाए और जल्द से जल्द मदद मिले।
