- किताबें-नोटबुक्स बाजार मूल्य से 300-400% महंगे
- हर साल नई किताबें अनिवार्य करवाना, पुरानी किताबों को बैन करना
- यूनिफॉर्म, जूते, बैग आदि केवल खास दुकानों से ही खरीदने का दबाव
- फीस के अलावा अलग से “स्टेशनरी चार्ज” या “किताब चार्ज” वसूलना
- विरोध करने वाले अभिभावकों को स्कूल में अपमानित करना
इस प्रथा ने शिक्षा को व्यापार बना दिया है। अभिभावक पहले ही महंगी फीस, बस किराया और कोचिंग का बोझ उठा रहे हैं, उसके ऊपर यह अतिरिक्त शोषण। कई मध्यमवर्गीय परिवार इस वजह से बच्चों की पढ़ाई बीच में छोड़ने या स्कूल बदलने पर मजबूर हो रहे हैं।अभिभावकों की मांग
- दोषी प्रिंसिपल और स्कूल मालिक के खिलाफ सख्त कार्रवाई
- किताबों की कीमतों पर कैपिंग और बाजार दर से ज्यादा न बेचने का कानून
- अभिभावक-शिक्षक संघों में पारदर्शी मूल्य निर्धारण की व्यवस्था
- स्कूलों को किताबें बेचने का लाइसेंस खत्म करना
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की गई है कि वे इस “एजुकेशन माफिया” पर लगाम कसें। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना है, न कि अभिभावकों को लूटना।अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो निजी शिक्षा व्यवस्था का विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा। अभिभावक संगठन अब इस मुद्दे को लेकर प्रदेशव्यापी आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं।
