नोएड़ा में “शुक्रिया मुकेश”: जब एक अमर आवाज़ ने दिलों को फिर से जीवित कर दिया

नोएडा,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
कुछ आवाज़ें समय के साथ दब जाती हैं। कुछ आवाज़ें समय को पार कर जाती हैं। मुकेश की आवाज़ दूसरी श्रेणी की थी।
रविवार की शाम नोएडा के एनईए भवन सभागार, सेक्टर-6 में जब नवरत्न फाउंडेशन्स का 21वाँ वार्षिक आयोजन ‘शुक्रिया मुकेश-2026’ शुरू हुआ, तो लगा जैसे बीते दशकों की यादें एक साथ लौट आई हों।

यह महज़ एक संगीत कार्यक्रम नहीं था। यह कृतज्ञता का उत्सव था। उस सादगी भरी आवाज़ के प्रति धन्यवाद, जो कभी दिखावे की नहीं, दिल की भाषा बोलती थी। मंच पर जब ‘जाने कहाँ गए वो दिन’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’, ‘एक प्यार का नगमा है’, ‘मैं न भूलूंगा’, ‘मेरा जूता है जापानी’ और ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’ जैसे गीत गूंजे, तो श्रोता सिर्फ़ तालियाँ नहीं बजा रहे थे। वे अपनी जिंदगी के उन पन्नों को पलट रहे थे, जिन्हें मुकेश की आवाज़ ने कभी सहलाया था।

ज़ी टीवी के ‘सा रे गा मा पा लिटिल चैंप्स’ और ‘द राइजिंग स्टार’ से पहचाने जाने वाले दिवाकर शर्मा की विशेष प्रस्तुति ने शाम को ऊँचाई दी। उनके साथ डॉ. अशोक श्रीवास्तव, संजय पांडेय, सोमेश्वर शर्मा, पंकज माथुर, कपिल तिवारी और विनय सेठिया ने मुकेश के कालजयी गीत गाकर उन्हें संगीतमयी श्रद्धांजलि अर्पित की।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण श्रीमती अनिता भालवार का लंबे अंतराल के बाद साहित्यिक अंदाज़ में मंच संचालन रहा। उनके साथ डॉ. अशोक श्रीवास्तव और आरजे कपिल तिवारी ने भी मंच संभाला। गंधर्व बैंड और जीतू बजाज के साउंड ने पूरे आयोजन को मजबूत संगीतात्मक आधार दिया। डिजिटल प्रस्तुति में संजय पांडेय, पंकज माथुर और अंशुमाली सिन्हा का सहयोग रहा।

नवरत्न फाउंडेशन्स के अध्यक्ष डॉ. अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि मुकेश जी की आवाज़ में सादगी और अपनापन था, जो आज भी सीधे दिल तक पहुँचता है। ‘शुक्रिया मुकेश’ उसी अमर आवाज़ के प्रति कृतज्ञता का भाव है।इस अवसर पर लायन मान सिंह चौहान, मुकुल वाजपेयी, बाबा कानपुरी, ज्योति सक्सेना, मृदुला सक्सेना, नवनीत सक्सेना, अनुभा उपाध्याय, विनोद पाण्डेय, अवनींद्र ठाकुर, मुकेश निगम, अरविंद श्रीवास्तव, वर्षा श्रीवास्तव, आर.एन. श्रीवास्तव, रंजन तोमर, राजीव गर्ग, आर.सी. गुप्ता, रंजना चितकारा, प्रेम सागर प्रेम, कर्नल अमिताभ अमित, गीता तिवारी, कमांडर अलोक माथुर, डॉ. कल्पना भूषण और विजय सिंह सहित अनेक सम्मानित अतिथि उपस्थित रहे और कार्यक्रम का भरपूर आनंद लिया। अंत में सभी कलाकारों और अतिथियों को उपहार देकर सम्मानित किया गया।

प्रेरणा यहीं छिपी है।

मुकेश कभी चमक-दमक के गायक नहीं बने। उनकी ताकत सरलता थी। वे गाते नहीं थे, महसूस कराते थे। आज जब दुनिया तेज़ और कृत्रिमता की ओर बढ़ रही है, तब एक शाम ऐसे गीतों के साथ बैठना याद दिलाता है कि असली कला वही है जो समय बीतने के बाद भी दिल में गूंजती रहे।कार्यक्रम समाप्त हो गया। लोग घर लौट गए। लेकिन सभागार से निकलते कदमों में अभी भी वही सुर चल रहे थे। क्योंकि कुछ आवाज़ें खामोश नहीं होतीं। वे याद बन जाती हैं। और यादें इंसान को जीने का कारण देती हैं।

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