नोएडा, (नोएडा खबर डॉट कॉम)
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव में तंबूरा हाथ में लिए एक युवक भजन गाता था। आँखें दुनिया नहीं देख पाती थीं, लेकिन सुर साफ देख लेते थे कि भक्ति कहाँ बैठती है। वही युवक आज फिल्म हनुमान अंश के भजन “मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डार दई” की वजह से देशभर में पहचाना जा रहा है। नाम है सुनील लोधी
बचपन: तंबूरा, दादी और हनुमान का भरोसा
सुनील की संगीत यात्रा करीब 10-11 साल की उम्र से शुरू हुई। उन्होंने खुद बताया है कि बचपन से तंबूरा बजाते हैं। शास्त्रीय सरगम की औपचारिक पाठशाला उनके पास नहीं थी। उन्होंने लता मंगेशकर के गाने सुन-सुनकर गाना सीखा। आँखें नहीं थीं, इसलिए कान और याददाश्त ही गुरु बने।
हनुमान भक्ति भी बचपन से थी। वे याद करते हैं कि दादी से हनुमान चालीसा और मंगल उपवास करने को कहा करते थे। दादी कहती थीं कि कलियुग में साधारण जन हनुमान की कठिन साधना नहीं कर सकते, बस भक्ति भाव रखो। वह भाव बाद में उनके गायन का केंद्र बन गया। परिवार के बाकी सदस्यों—माता-पिता, भाई-बहन—के सार्वजनिक नाम और विस्तृत परिचय अभी बहुत कम उपलब्ध हैं।
सुनील अपनी निजी जिंदगी को शांत रखते हैं। जो बात बार-बार आती है, वह यह है कि दृष्टिबाधित होने के कारण आसपास के लोग रास्ता बताते हैं, सहारा देते हैं। वे खुद कहते हैं—“क्योंकि मैं देख नहीं सकता, आसपास वाले बताते रहते हैं कि क्या करना है।”
बुंदेली दुनिया से वायरल भजन तक
पहले वे अपने इलाके में भजन और बुंदेली लोकगीत गाते रहे। फिर ‘बुंदेली दुनिया’ पेज पर गाने आने लगे। अंकित पांडेय के साथ मेरा दूल्हा बन के आ गया ठेला और गौरा सांची बताओ जैसे गीत लोगों तक पहुँचे। 2024 में प्रियंका चौधरी के साथ कर कर के मर गए किसानी जैसा लोकगीत भी आया, जिसमें गाँव और किसान की पीड़ा थी।
असली मोड़ आया पारंपरिक हनुमान भजन “मोरे संकट के कटैया” से। सादी रिकॉर्डिंग, तंबूरा और सुनील की कच्ची-सच्ची आवाज़। फिल्ममेकर-म्यूजिक प्रोड्यूसर पंकज वीआरके की कानों में यह आवाज़ पड़ी। भजन सोशल मीडिया पर फैल गया। रिपोर्टों के अनुसार इसे दो करोड़ नब्बे लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। यहीं से स्थानीय गायक का चेहरा राष्ट्रीय पहचान बना।
इंदौर, मुंबई और हनुमान अंश
पहली बार इंदौर, फिर मुंबई। साईं बाबा स्टूडियो में करीब आठ गाने रिकॉर्ड हुए। उनमें से एक था “मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान”—वही पारंपरिक भजन, जो हनुमान अंश के साउंडट्रैक का हिस्सा बना। नीम करोली बाबा की कथा पर बनी इस फिल्म में यह भजन सिर्फ़ गाना नहीं, फिल्म की आत्मा जैसा महसूस होता है। नैया सागर में डाल देने का रूपक और हनुमान पर पूरा भरोसा—सुनील की आवाज़ में वही समर्पण गूँजता है, जो वे बचपन से गाते आए हैं।
वे सपना रखते हैं कि एक दिन जुबिन नौटियाल के साथ गा सकें। लेकिन फिलहाल उनकी पहचान दिखावे से नहीं, भरोसे से बनी है। आँखें रोशनी नहीं देतीं, तंबूरा देता है। गाँव की गली से बड़े पर्दे तक का यह सफर याद दिलाता है—कुछ आवाज़ें प्रशिक्षण से नहीं, श्रद्धा से निकलती हैं। और जब श्रद्धा गूँजती है, तो नैया खुद पार लग जाती है।
