नोएडा,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय, दिल्ली में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर नोएडा व पश्चिमी यूपी से जुड़े एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय महामंत्री से महत्वपूर्ण मुलाकात की है। इस मुलाकात में नोएडा, जेवर, दादरी, साहिबाबाद व गाजियाबाद के लिए बिहार व पूर्वांचल की ताकत का अहसास पार्टी नेताओं को कराया गया।
अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद के अध्यक्ष शैलेन्द्र मिश्र अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ भाजपा राष्ट्रीय महामंत्री एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े से मिले। प्रतिनिधिमंडल ने तावड़े का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पांच विधानसभा सीटों पर अपने समाज के उम्मीदवार देने की मांग रखी। परिषद का दावा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बिहार, पूर्वांचल और मिथिलांचल से आए लोग करीब 60 से 70 लाख हैं। इन्हीं इलाकों में नोएडा, दादरी, जेवर, गाजियाबाद और साहिबाबाद जैसी सीटें आती हैं।
मिश्र ने कहा कि ये पांचों सीटें बिहार-पूर्वांचल समाज को दी जाएं, तभी “सबका साथ, सबका विकास” सार्थक होगा। उन्होंने “जितनी भागीदारी, उतनी हिस्सेदारी” का तर्क दिया और दावा किया कि ये सीटें मिलने पर यह संगम का पत्थर साबित होगा तथा विकास की गंगा बहेगी।तावड़े ने तत्काल कोई वादा नहीं किया। उन्होंने कहा कि पांचों प्रस्तावित प्रत्याशियों का बायोडाटा जमा किया जाए। चुनाव वर्किंग कमेटी इस पर विचार करेगी और टीम की बैठक भी कराई जाएगी।
प्रतिनिधिमंडल में शैलेन्द्र मिश्र, दिवाकान्त झा, छाया तिवारी, मुकेश भाटी, डॉ. इंदिरा मिश्र, पुष्पा पटेल, पूनम सिंह, सुनील सिरसा, प्रदीप शर्मा, किशन लाल सहित कई लोग शामिल थे।
राजनीतिक विश्लेषण
यह मुलाकात महज औपचारिक शिष्टाचार नहीं लगती। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एनसीआर की सीटें भाजपा के लिए संवेदनशील हैं। नोएडा, दादरी, जेवर, गाजियाबाद और साहिबाबाद शहरीकरण, प्रवासी आबादी, उद्योग और भूमि-विकास के मुद्दों से जुड़ी सीटें हैं। यहां पुरानी स्थानीय बिरादरी के साथ पूर्वांचल-बिहार मूल के मतदाताओं की संख्या भी बढ़ी है। मैथिली परिषद इसी बदलाव को संगठित दबाव में बदलने की कोशिश कर रही है।
मांग का लहजा साफ है—वोट बैंक की गिनती दिखाकर टिकट में हिस्सेदारी मांगना। “60-70 लाख” का आंकड़ा संगठन का दावा है, स्वतंत्र सत्यापन फिलहाल सार्वजनिक नहीं है। फिर भी राजनीतिक रूप से यह आंकड़ा इसलिए इस्तेमाल हो रहा है ताकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सिर्फ स्थानीय समीकरणों का इलाका न माना जाए।
तावड़े की प्रतिक्रिया पार्टी की सामान्य शैली से मेल खाती है। बायोडाटा मंगाना और वर्किंग कमेटी का हवाला देना न तो तुरंत स्वीकार है, न सीधा इंकार। इससे भाजपा मौजूदा स्थानीय नेताओं, अन्य जातियों और पुराने दावेदारों को नाराज किए बिना मांग को प्रक्रिया में बांध देती है। साथ ही पूर्वांचली संगठनों को यह संदेश भी जाता है कि दरवाजा बंद नहीं है।एनसीआर में यह नया मोड़ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां चुनाव अब केवल विकास या कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया। प्रवासी पहचान, मूल राज्य से जुड़ाव और टिकट वितरण की हिस्सेदारी भी एजेंडा बन रही है।
अगर भाजपा इनमें से कुछ सीटों पर पूर्वांचल-बिहार चेहरे आगे बढ़ाती है, तो यह सामाजिक समीकरण बदल सकता है। अगर नहीं बढ़ाती, तो यही संगठन बाद में उपेक्षा का मुद्दा बना सकते हैं।संक्षेप में, मैथिली परिषद ने शिक्षक या सांस्कृतिक मंच से आगे बढ़कर चुनावी सौदेबाजी का रास्ता चुना है। तावड़े ने इसे सुन लिया है, पर फैसला पार्टी की आंतरिक समिति पर छोड़ दिया है। 2027 से पहले एनसीआर की टिकट-राजनीति अब स्थानीय बनाम प्रवासी दावे की नई परत जोड़ चुकी है।
