अक्षत नोटिस विवाद: गौतमबुद्ध नगर में बाहर आई अधिकारों की लड़ाई, डीएम ने साफ किया—मजिस्ट्रेट शक्तियां पुलिस कमिश्नरेट के पास हैं।

विनोद शर्मा
नोएडा,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जंतर-मंतर प्रदर्शन से जोड़कर जारी किए गए नोटिस ने जिले में सिर्फ एक छात्र मामले को नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारों की पुरानी लड़ाई को भी सतह पर ला दिया है। शुरू में कई रिपोर्टों में यह नोटिस जिलाधिकारी द्वारा जारी बताया गया, जबकि बाद में तस्वीर बदली। जिला प्रशासन का स्पष्टीकरण है कि मजिस्ट्रेट संबंधी सारी शक्तियां पुलिस कमिश्नरेट के पास हैं। इसी के साथ प्रशासन ने संबंधित अधिसूचना की प्रति भी जारी की।

मामले की जड़ थाना इकोटेक-1 की पुलिस रिपोर्ट है। इसी रिपोर्ट के आधार पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट तृतीय, ग्रेटर नोएडा कमिश्नरेट की अदालत से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 के तहत अक्षत को नोटिस भेजा गया। उनसे छह माह तक शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी मुचलका मांगा गया था। सुनवाई पांच सितंबर तय थी। विवाद बढ़ने और सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर तीखे सवाल उठने के बाद पुलिस पक्ष का कहना रहा कि नोटिस चार सितंबर को ही निरस्त कर दिया गया।

यहीं से अधिकारों का टकराव दिखाई देता है। गौतमबुद्ध नगर में 2020 से पुलिस आयुक्तालय व्यवस्था लागू है। इसके तहत शांति भंग की आशंका, मुचलका, निषेधात्मक आदेश जैसी कई कार्यपालक मजिस्ट्रेट शक्तियां जिलाधिकारी कार्यालय से हटकर पुलिस कमिश्नर और उनके अधीन अधिकारियों के पास चली गईं। इसलिए इस मामले में “डीएम ने नोटिस जारी किया” वाली हेडलाइन तथ्यात्मक रूप से गलत थी। नोटिस का स्रोत थाना इकोटेक था और कार्रवाई कमिश्नरेट व्यवस्था के मजिस्ट्रेट तंत्र से हुई।

राजनीतिक-प्रशासनिक विश्लेषण यह है कि छात्र अक्षत सिर्फ विवाद का केंद्र नहीं, अधिकार-रेखा को सार्वजनिक करने का माध्यम बन गए। जब सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कार्रवाई का ठीकरा जिला प्रशासन पर फोड़ा, तब डीएम कार्यालय को अधिसूचना दिखाकर दूरी बनानी पड़ी।

दूसरी ओर, कमिश्नरेट व्यवस्था में पुलिस रिपोर्ट से लेकर मजिस्ट्रेट नोटिस तक की कड़ी एक ही ढांचे में चलती है। इससे जवाबदेही भी उसी तंत्र पर आती है।सुप्रीम कोर्ट में भी यही सवाल गूंजा कि छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई न करने के निर्देश के बावजूद नोटिस कैसे निकला। अदालती टिप्पणी के बाद नोटिस वापसी ने विवाद को और तेज किया। नतीजा यह हुआ कि मूल मुद्दा—प्रदर्शन में शामिल छात्र पर शांति-बंधपत्र अब दूसरे बड़े सवाल में बदल गया है: गौतमबुद्ध नगर में कानून-व्यवस्था की अंतिम कलम किसके पास है, जिला प्रशासन के पास या पुलिस कमिश्नरेट के पास?

अक्षत प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें तीन परतें एक साथ खुल गईं। पहली, थाना स्तर की रिपोर्ट। दूसरी, कमिश्नरेट के कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा नोटिस। तीसरी, जिला प्रशासन द्वारा यह स्पष्ट करना कि ये शक्तियां अब उनके पास नहीं हैं। कमिश्नरेट सिस्टम लागू होने के बाद भी आम चर्चा में “डीएम बनाम पुलिस” वाली पुरानी भाषा चलती रहती है। यह मामला उसी भाषा और नई व्यवस्था के बीच का फासला दिखाता है।

अब देखना यह है कि नोटिस वापसी के बाद भी प्रशासन और पुलिस के बीच जिम्मेदारी का बंटवारा सार्वजनिक रूप से कितना साफ रहता है। अक्षत का नोटिस रद्द हो सकता है, लेकिन गौतमबुद्ध नगर में अधिकार-क्षेत्र की बहस इस प्रकरण के साथ एक बार फिर खुल चुकी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *