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यूपी की राजनीति: पूर्व विधायक जोगेंद्र अवाना यूपी विधानसभा के चुनाव में उतरने को तैयार: राजस्थान RLD अध्यक्ष की पश्चिम यूपी पर नजर, बागपत-किठौड़ सीटों पर दांव
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यूपी की राजनीति: पूर्व विधायक जोगेंद्र अवाना यूपी विधानसभा के चुनाव में उतरने को तैयार: राजस्थान RLD अध्यक्ष की पश्चिम यूपी पर नजर, बागपत-किठौड़ सीटों पर दांव

विनोद शर्मा

नोएडा,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
राजस्थान में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के प्रदेश अध्यक्ष जोगेंद्र सिंह अवाना अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने जा रहे हैं। नोएडा के झुंडपुरा गांव के मूल निवासी और पूर्व बसपा-कांग्रेस विधायक अवाना पश्चिम यूपी की बागपत या किठौड़ विधानसभा सीट पर रालोद के कोटे से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। जयंत चौधरी के करीबी माने जाने वाले इस नेता के इस कदम को रालोद की 2027 यूपी चुनाव रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अभी तक कि राजनीतिक यात्रा

अवाना 2018 में राजस्थान की नदबई सीट से बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए, लेकिन 2023 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। अप्रैल 2025 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ रालोद का दामन थामा और मई में जयंत चौधरी ने उन्हें राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। अब वे अपनी जड़ों वाले गौतमबुद्ध नगर और आसपास के पश्चिमी यूपी के जिलों में वापसी की तैयारी कर रहे हैं।

रालोद-NDA गठबंधन में गुर्जर कार्ड

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अवाना का यूपी में आना रालोद की विस्तारवादी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी मुख्य रूप से जाट-बहुल इलाकों में मजबूत है, लेकिन गुर्जर समुदाय को साथ लाकर पश्चिम यूपी में अपना वोट बैंक बढ़ाना चाहती है। बागपत क्षेत्र में गुर्जर-जाट समीकरण अहम भूमिका निभाता है।

अवाना का हालिया कदम

जब बीजेपी ने नवाब सिंह नागर को पश्चिम यूपी का क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया, तब उनका स्वागत करना – NDA के अंदर समन्वय और क्रॉस-वोटिंग की कोशिश को दर्शाता है। रालोद सूत्रों का कहना है कि यदि अवाना को टिकट मिला तो वे मजबूत जनाधार वाले उम्मीदवार के रूप में उभर सकते हैं। पूर्व विधायक होने के नाते उनका प्रशासनिक अनुभव और स्थानीय मुद्दों (किसान, भूमि अधिग्रहण, शहरी विकास) पर पकड़ उन्हें लाभ देगी।

चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि, रास्ता आसान नहीं है। पश्चिम यूपी में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन का मुकाबला कड़ा रहने वाला है। बागपत और आसपास की सीटों पर स्थानीय जाट-गुर्जर नेता पहले से सक्रिय हैं। 2022 के चुनाव में रालोद-SP गठबंधन था, लेकिन अब रालोद एनडीए में है, जिससे वोट ट्रांसफर का समीकरण बदल गया है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अवाना का यह शिफ्ट रालोद को गुर्जर वोटों का अतिरिक्त सहारा दे सकता है, लेकिन पार्टी संगठन और स्थानीय स्तर पर स्वीकार्यता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। पूर्व सांसद मलूक नागर भी अब रालोद में अहम भूमिका में है। यदि जोगेंद्र अवाना टिकट पाने में सफल रहे तो यह जयंत चौधरी की नेतृत्व क्षमता को और मजबूती देगा।

2027 का महासंग्राम:
यूपी विधानसभा चुनाव से पहले रालोद पश्चिमी जिलों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए नए चेहरों पर दांव खेल रही है। अवाना जैसे नेता, जो राज्यों की सीमाओं पार कर सकें, क्षेत्रीय दलों की नई रणनीति का प्रतीक बन रहे हैं। अब देखना यह है कि BJP-रालोद गठबंधन उन्हें कितनी सीटें और कितना महत्व देता है।

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