नोएडा, (नोएडा खबर डॉट कॉम)
कभी सोचा है… जब शहर की भागदौड़ में हम अपनी बोली, अपने गीत, अपनी परंपराएँ भूलने लगते हैं, तो क्या बचता है हमारी पहचान का ?
उत्तराखंड की मिट्टी से दूर नोएडा में बसे हम सबके मन में एक सवाल बार-बार उठता है—क्या हमारी संस्कृति सिर्फ यादों में सिमट जाएगी, या हम इसे जीवित रख पाएँगे?इसी सवाल का जवाब देने के लिए रविवार को एक छोटी-सी बैठक हुई। लेकिन वह बैठक सिर्फ बैठक नहीं थी। वह एक संकल्प था। एक वादा था आने वाली पीढ़ियों से।
उत्तराखंड की मिट्टी से दूर नोएडा में बसे हम सबके मन में एक सवाल बार-बार उठता है—क्या हमारी संस्कृति सिर्फ यादों में सिमट जाएगी, या हम इसे जीवित रख पाएँगे?इसी सवाल का जवाब देने के लिए रविवार को एक छोटी-सी बैठक हुई। लेकिन वह बैठक सिर्फ बैठक नहीं थी। वह एक संकल्प था। एक वादा था आने वाली पीढ़ियों से।
उस दिन सर्वसम्मति से 16वें महाकौथिग-2026 की नई कार्यकारिणी का गठन हुआ। श्रीमती इंदिरा चौधरी को अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। आदित्य घिल्डियाल चेयरमैन बने और हरीश असवाल वाइस चेयरमैन।
मुख्य संयोजक राजेंद्र चौहान, संयोजिका कल्पना चौहान, उपाध्यक्ष केशव जोशी, महासचिव लक्ष्मण रावत, कोषाध्यक्ष सुबोध थपलियाल, सांस्कृतिक सचिव सीमा पंवार, सह सांस्कृतिक सचिव शीला पंत, प्रशासनिक सचिव राजेंद्र रावत, प्रमुख व्यवस्थापक आई.पी. उनियाल, वरिष्ठ व्यवस्थापक देवेंद्र सिंह रावत, वरिष्ठ सलाहकार जगत सिंह रावत, संरक्षक नरेंद्र सिंह, स्टॉल प्रभारी सुषमा जोशी, डायरेक्टर रेखा चौहान और मीडिया प्रभारी रजनी ढौंडियाल जोशी व नीरज रावत—ये सभी नाम सिर्फ पद नहीं हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने कहा—“हम अकेले नहीं, पूरा समुदाय साथ है।”
मुख्य संयोजक राजेंद्र चौहान, संयोजिका कल्पना चौहान, उपाध्यक्ष केशव जोशी, महासचिव लक्ष्मण रावत, कोषाध्यक्ष सुबोध थपलियाल, सांस्कृतिक सचिव सीमा पंवार, सह सांस्कृतिक सचिव शीला पंत, प्रशासनिक सचिव राजेंद्र रावत, प्रमुख व्यवस्थापक आई.पी. उनियाल, वरिष्ठ व्यवस्थापक देवेंद्र सिंह रावत, वरिष्ठ सलाहकार जगत सिंह रावत, संरक्षक नरेंद्र सिंह, स्टॉल प्रभारी सुषमा जोशी, डायरेक्टर रेखा चौहान और मीडिया प्रभारी रजनी ढौंडियाल जोशी व नीरज रावत—ये सभी नाम सिर्फ पद नहीं हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने कहा—“हम अकेले नहीं, पूरा समुदाय साथ है।”
इस बार मंच पर माँ सुरकंडा देवी का स्वरूप विराजमान होगा। जैसे माँ अपनी संतानों की रक्षा करती हैं, वैसे ही यह महाकौथिग हमारी संस्कृति की रक्षा करेगा। महाकौथिग सिर्फ मेला नहीं है। यह एक जनआंदोलन है।
यहाँ लोकगीत गूँजेंगे, लोकनृत्य थिरकेंगे, पारंपरिक वाद्ययंत्र बोलेंगे, हस्तशिल्प चमकेंगे और पहाड़ी व्यंजनों की खुशबू फैलेगी। बच्चों और युवाओं को अपनी बोली, अपने रीति-रिवाज और अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए खास कार्यक्रम होंगे। देश-विदेश में बसे प्रवासी उत्तराखंडी भी अपनी संस्कृति से फिर जुड़ सकेंगे।कार्यकारिणी के हर सदस्य ने एक ही बात दोहराई—
“आज के बदलते समय में अपनी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
अगर हम नहीं उठाएँगे, तो कौन उठाएगा?”यह कहानी सिर्फ उनकी नहीं है। यह हमारी है।
आपकी भी। मेरे भी।
हर उस व्यक्ति की, जिसके दिल में अभी भी पहाड़ की मिट्टी की खुशबू बाकी है।तो आइए, इस बार सिर्फ दर्शक न बनें।
हिस्सा बनें। सहयोग दें। साथ चलें। क्योंकि महाकौथिग का संकल्प बहुत साफ है—
“अपनी संस्कृति – अपनी पहचान,
अपनी विरासत – अपनी शान।”जब हम एक साथ खड़े होते हैं, तो संस्कृति मरती नहीं… वह और मजबूत हो जाती है।
16वाँ महाकौथिग-2026 हम सबका है।
आओ, इसे यादगार बनाएँ।
यहाँ लोकगीत गूँजेंगे, लोकनृत्य थिरकेंगे, पारंपरिक वाद्ययंत्र बोलेंगे, हस्तशिल्प चमकेंगे और पहाड़ी व्यंजनों की खुशबू फैलेगी। बच्चों और युवाओं को अपनी बोली, अपने रीति-रिवाज और अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए खास कार्यक्रम होंगे। देश-विदेश में बसे प्रवासी उत्तराखंडी भी अपनी संस्कृति से फिर जुड़ सकेंगे।कार्यकारिणी के हर सदस्य ने एक ही बात दोहराई—“आज के बदलते समय में अपनी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
अगर हम नहीं उठाएँगे, तो कौन उठाएगा?”यह कहानी सिर्फ उनकी नहीं है। यह हमारी है।
आपकी भी। मेरे भी।
हर उस व्यक्ति की, जिसके दिल में अभी भी पहाड़ की मिट्टी की खुशबू बाकी है।तो आइए, इस बार सिर्फ दर्शक न बनें।
हिस्सा बनें। सहयोग दें। साथ चलें। क्योंकि महाकौथिग का संकल्प बहुत साफ है—
“अपनी संस्कृति – अपनी पहचान,
अपनी विरासत – अपनी शान।”जब हम एक साथ खड़े होते हैं, तो संस्कृति मरती नहीं… वह और मजबूत हो जाती है।
16वाँ महाकौथिग-2026 हम सबका है।
आओ, इसे यादगार बनाएँ।
