विनोद शर्मा
नोएडा, (नोएडा खबर डॉट कॉम)
दादरी विधानसभा सीट पर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले एक पुराना सवाल फिर चर्चा में है—क्या कोई राजनीतिक दल यहां महिला प्रत्याशी उतारकर इतिहास रचने की कोशिश करेगा 
? करीब 70 वर्ष पहले कांग्रेस की सत्यवती रावल दादरी से विधायक बनीं थीं। उसके बाद अभी तक यह सीट पुरुष नेताओं के वर्चस्व वाली रही।
अब महिला आरक्षण की राष्ट्रीय बहस और क्षेत्रीय दावेदारियों के बीच दादरी व जेवर दोनों सीटों पर महिला चेहरों की सक्रियता बढ़ गई है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लागू होने के बाद दलों पर महिलाओं को मैदान में उतारने का नैतिक और चुनावी दबाव बढ़ा है। हालांकि विधानसभा चुनावों में यह आरक्षण चरणबद्ध तरीके से लागू होना है, फिर भी पार्टियां प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर महिला उम्मीदवारों का परीक्षण कर रही हैं।
नजदीकी उदाहरण: नोएडा, सिकंदराबाद और खुर्जा
इसी जिले में भाजपा ने 2014 के नोएडा उपचुनाव में विमला बाथम को मैदान में उतारा था। वे नोएडा सीट की पहली महिला विधायक बनीं। सिकंदराबाद से विमला सोलंकी पहले विधायक रह चुकी हैं। इस समय बुलंदशहर की खुर्जा विधानसभा से भाजपा की मीनाक्षी सिंह विधायक हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महिला प्रत्याशी जीत भी हासिल कर चुकी हैं, बशर्ते पार्टी संगठन और स्थानीय समीकरण उनके साथ हों।
गौतमबुद्धनगर लोकसभा क्षेत्र में इस समय जेवर और दादरी ही ऐसी दो विधानसभा सीटें मानी जा रही हैं, जहां महिला नेताओं की नजर सबसे साफ दिख रही है। नोएडा सीट पर मौजूदा समीकरण अलग हैं, जबकि इन दोनों ग्रामीण-अर्धशहरी सीटों पर नई दावेदारी उभर रही है।
दादरी में दो नाम चर्चा में
भाजपा में दादरी नगरपालिका की चेयरमैन गीता पंडित की दावेदारी स्थानीय स्तर पर सबसे पुरानी और संगठित मानी जाती है। नगर निकाय का अनुभव और क्षेत्रीय संपर्क उनके पक्ष में गिनाया जा रहा है। दूसरी ओर, हाल के महीनों में विवादित रहे ग्रेटर नोएडा के पूर्व जीएम रवींद्र तोगड़ की पत्नी कुशल सिंह का भी दादरी से जुड़ाव चर्चा में है। पार्टी के अंदर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है, लेकिन दोनों नाम टिकट की अटकलों में शामिल हैं।
जेवर और नोएडा पर शालिनी सिंह की बढ़ती सक्रियता
जेवर और नोएडा सीट पर पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह की बेटी शालिनी सिंह पिछले कुछ महीनों से सामाजिक कार्यक्रमों, स्कूलों और स्थानीय मंचों पर दिखाई दे रही हैं। उनकी इस सक्रियता को 2027 की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में उनके संभावित चुनावी दौड़ में उतरने की चर्चा है, हालांकि उन्होंने अभी तक स्पष्ट रूप से किसी एक सीट या पार्टी का ऐलान नहीं किया है।
इतिहास दोहराना आसान नहीं
सत्यवती रावल का उदाहरण याद दिलाता है कि दादरी कभी महिला प्रतिनिधित्व देख चुका है, लेकिन तबसामाजिक-राजनीतिक ढांचा अलग था। आज की दादरी सीट पर विकास, भूमि, बिजली, नगर निकाय और जातीय समीकरण साथ-साथ चलते हैं। इसलिए केवल महिला चेहरा पर्याप्त नहीं होगा। दलों को तय करना होगा कि वे प्रतीकात्मक प्रयोग करना चाहते हैं या जीत योग्य उम्मीदवार।
2014 में नोएडा उपचुनाव में भाजपा का महिला प्रत्याशी वाला दांव सफल रहा था। 2027 में दादरी पर वैसा प्रयोग होगा या नहीं, यह पार्टी हाईकमान, स्थानीय गुटबाजी और विपक्ष की रणनीति पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना तय है कि गीता पंडित, कुशल सिंह और जेवर व नोएडा में शालिनी सिंह जैसे चेहरे इस बहस को जीवित रखे हुए हैं—क्या दादरी की जनता आने वाले चुनाव में एक महिला विधायक देखेगी ?
