नोटों पर सिर्फ गांधी क्यों? कला शिक्षाविद बाथम की चिट्ठी से उठी नई मुहिम

नई दिल्ली, (नोएडा खबर डॉट कॉम)

भारतीय मुद्रा नोटों के हर मूल्य वर्ग पर पिछले तीन दशक से एक ही चेहरा छाया हुआ है—महात्मा गांधी का। अब एक नई मुहिम यह सवाल उठा रही है कि क्या स्वतंत्र भारत की महानता को सिर्फ एक चित्र तक सीमित रखना चाहिए। देश के जाने-माने कला शिक्षाविद और कोशकार रूपनारायण बाथम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि नोटों पर गांधी जी के साथ-साथ अन्य महापुरुषों के चित्र भी छापे जाएँ। उनका कहना है कि इससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी और युवा पीढ़ी को यह संदेश नहीं जाएगा कि देश में गांधी के अलावा कोई और महान पुरुष था ही नहीं।

बाथम के पत्र का मूल तर्क सीधा है। 1947 के बाद लंबे समय तक नोटों पर अशोक स्तंभ का सिंह शीर्ष रहा। गांधी पहली बार 1969 में जन्म शताब्दी के स्मारक नोट पर आए। 1996 की महात्मा गांधी श्रृंखला के बाद उनका चित्र सभी मूल्य वर्गों का स्थायी चेहरा बन गया। पीछे की ओर मंदिर, स्मारक और विरासत स्थल बदलते रहे, आगे का चित्र नहीं।

बाथम लिखते हैं कि अमेरिका ने अपने नोटों पर वाशिंगटन, लिंकन, जेफरसन, फ्रैंकलिन जैसे अलग-अलग राष्ट्रनिर्माताओं को जगह दी। भारत भी गौतम बुद्ध, गुरु नानक देव, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, सुभाष चंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर, भगत सिंह, बाबासाहेब आंबेडकर, चंद्रशेखर आजाद और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे योद्धा, विचारक, वैज्ञानिक और समाज सुधारकों को विभिन्न मूल्य वर्गों पर छाप सकता है।

यह मांग पहली बार नहीं उठी है। आरबीआई की एक समिति पहले भी इस पर विचार कर चुकी है और निष्कर्ष निकाला था कि भारत के लोकाचार का प्रतिनिधित्व गांधी से बेहतर कोई नहीं कर सकता। टैगोर, कलाम या अन्य नामों के प्रस्ताव समय-समय पर आए, लेकिन नीति नहीं बदली। बाथम गांधी को हटाने की बात नहीं कर रहे। वे कहते हैं कि एक चेहरे की एकाधिकारिता इतिहास को संकुचित करती है। विविधता वाले देश में नोट हर नागरिक की जेब में चलता-फिरता राष्ट्रीय पाठ हो सकता है।

विश्व के सौ से अधिक देश अपने नोटों पर नेता, साहित्यकार, वैज्ञानिक, कलाकार और समाज सुधारकों को बारी-बारी जगह देते हैं। कनाडा तो श्रृंखला बदलता भी रहता है। भारत में यह बहस अब इसलिए फिर गरम हो सकती है क्योंकि सरकार ने ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोटों के क्षेत्र परीक्षण को मंजूरी दे दी है। आरबीआई सफल परीक्षण के बाद वित्त वर्ष 2028 से इन्हें लाने की तैयारी कर रहा है। कागजी नोट जल्दी फटते हैं, पॉलिमर ज्यादा टिकाऊ होते हैं। नई सामग्री पर नई डिजाइन श्रृंखला शुरू करने का यही अवसर हो सकता है।

बाथम पत्र के अंत में लिखते हैं कि पॉलिमर नोटों की शुरुआत विभिन्न क्षेत्रों की विभूतियों के चित्रों से की जाए। कला शिक्षाविद होने के नाते वे नोट को सिर्फ मुद्रा नहीं, दृश्य संस्कृति का हिस्सा मानते हैं। जेब में रखा नोट रोज लाखों बार देखा जाता है। अगर उस पर देश के अलग-अलग कोनों की विरासत दिखे, तो एकता का संदेश शब्दों से ज्यादा असरदार हो सकता है।प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के पास अब यह पत्र पहुँच चुका है।
मुहिम अभी व्यक्तिगत अपील से आगे सार्वजनिक बहस में तब्दील हो रही है—क्या भारतीय मुद्रा पर एक से अधिक चेहरे राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करेंगे या उसे और व्यापक बनाएंगे।

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