नोएडा, (नोएडा खबर डॉट कॉम)
सेक्टर-56 के सामुदायिक भवन में श्री राम रसायन सेवा संस्थान के तत्वावधान में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के पांचवें और छठे दिन आचार्य मनीष कौशिक महाराज ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, वृंदावन के महत्व, राधा-कृष्ण प्रेम और गोपी भाव की महिमा का वर्णन किया। दोनों दिनों कथा के बाद भजन संध्या और भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें सेक्टरवासियों समेत आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
पांचवें दिन आचार्य जी ने कहा कि भारतवर्ष में जन्म लेना सौभाग्य है, पर उससे बड़ा सौभाग्य उन लोगों का है जिन्हें श्रीधाम वृंदावन से जुड़ने का अवसर मिले। वृंदावन ठाकुर जी का निज धाम और प्रेम का परम केंद्र है। वहां से किसी भी प्रकार का संबंध स्थापित होना वास्तव में भगवान से संबंध जोड़ना है। उन्होंने कहा कि जो परमात्मा अनंत, अनादि, निर्गुण और निराकार हैं, वही गोपियों के प्रेम के वश में होकर सर्वसुलभ बन गए।
माता यशोदा के सौभाग्य का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस परम सत्ता को वेद भी पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर पाते, उसी परमात्मा को अपनी गोद में खिलाने का अवसर उन्हें मिला। श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं परमात्मा का सरल और मधुर स्वरूप सामने रखती हैं।उन्होंने भक्ति को केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न मानते हुए कहा कि प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा भी उनकी सेवा है। लीलाएं नदियों, वनों और गौसंवर्धन के संरक्षण का संदेश देती हैं। यमुना जी और गिरिराज महाराज का आध्यात्मिक व पर्यावरणीय महत्व बताते हुए श्रद्धालुओं से पर्यावरण के प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया। कथा के दौरान ठाकुर जी को छप्पन भोग अर्पित किया गया और गिरिराज पूजन भी हुआ।
छठे दिन आचार्य मनीष कौशिक महाराज ने श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप, राधा-कृष्ण प्रेम और गोपी भाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस संसार के सर्वोच्च कृष्ण-रस का नाम आनंद है। श्रीकृष्ण स्वयं रसस्वरूप हैं और राधारानी उनकी पराशक्ति। राधा-कृष्ण का मिलन जीव और परमात्मा के परम प्रेम का प्रतीक है। जब जीव पर भगवान की कृपा होती है, तभी यह दिव्य प्रेम और आनंद मिलता है।उन्होंने कहा कि जिनके लिए वेदों के गूढ़ रहस्य समझना कठिन था, उनके लिए भगवान ने श्रीमद्भागवत प्रदान की। भागवत साधारण ग्रंथ नहीं, श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप है, इसलिए मनुष्य को कल्याण के लिए श्रद्धा से इसका श्रवण करना चाहिए।

कथा में श्रीकृष्ण के मथुरा गमन और वहां के दिव्य विहार का उल्लेख किया गया। कहा गया कि भगवान की मूर्ति हर भक्त को उसकी भावना के अनुरूप दर्शन देती है। जैसी भावना, वैसा अनुभव। प्रभु का वास्तविक स्वरूप दिव्य है, जो केवल उनकी कृपा से अनुभव हो सकता है।कंस वध के बाद उद्धव को वृंदावन भेजने और गोपी-उद्धव संवाद का मार्मिक वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान ने गोपियों को संसार का सर्वोच्च भक्त माना है। गोपी कोई व्यक्ति विशेष नहीं, परम समर्पण और निष्काम प्रेम का भाव है। उनका प्रेम अनगिनत जन्मों की साधना का फल है। कथा के दौरान रुक्मिणी मंगल के भजन और गीत गाए गए। कार्यक्रम के बाद भंडारे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।