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ब्रेकिंग न्यूज़ – अगर रूल्स व रेगुलेशन की यह रिपोर्ट लागू हो जाती तो नोएडा में रुक सकते थे कई घोटाले , 7 साल से शासन में पेंडिंग है फ़ाइल

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-नोएडा में अगर ये रूल्स व रेगुलेशन लागू हो जाते तो रुक जाते घोटाले, 7 साल से शासन के पास लंबित है रिपोर्ट

– पूर्व वित्तीय सलाहकार आर एस कालरा ने दो साल की मेहनत से तैयार की थी रिपोर्ट

-2 फरवरी 2014 को बोर्ड बैठक में लगी थी मुहर

– बोर्ड मीटिंग का भी बनाया था रूल, अभी तक जूनियर स्तर के अधिकारी प्रतिनिधि के रूप में आकर बोर्ड बैठक में करते हैं भागीदारी, नही होता कोरम पूरा,

-लीज डीड  और एफएआर की शर्तों को लेकर भी तैयार की थी रिपोर्ट

विनोद शर्मा, नोएडा
नोएडा प्राधिकरण में लगातार हो रहे भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं को रोकने के लिए वर्ष 2010 में रूल्स व रेगुलेशन बनाने के लिए कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी की  रिपोर्ट प्राधिकरण के तत्कालीन फाइनेंस कंट्रोलर आर.एस. कालरा ने तैयार की थी। रिपोर्ट कई हजार पेज की है। इस रिपोर्ट में आर.एस कालरा ने 5 रूल्स व 3 रेगुलेशन तैयार कर उन्हें लागू करने की सिफारिश की थी। 2 फरवरी 2014 को हुई बोर्ड बैठक में इसे अप्रूव कर शासन को भेज दिया गया था। तब से इस रिपोर्ट को नोटिफिकेशन जारी होने का इंतजार है। इसमें सबसे अहम बिल्डर के साथ होने वाले लीज डीड एग्रीमेंट व एफएआर को लेकर भी था।
आपको यह सुनकर जरूर हैरानी होगी कि नोएडा प्राधिकरण के अपना कोई रूल्स या रेगुलेशन नहींं है। उन्हें दूसरे विभागों से अडॉप्ट किया गया है। जैसे इस समय जो प्रोजेक्ट वर्क चल रहे हैं उन्हें कभी यूपी पी डब्लू डी के रेट पर कराया जाता था। इसके बाद उन्हें दिल्ली के पीडब्ल्यूडी की तर्ज पर तो कभी केंद्र सरकार की एजेंसी के रेट पर कराया जाता रहा है। जैसे अधिकारी आए वैसे ही रूल्स लागू कर दिए। अब दिल्ली की बजाय फिर से यूपी वाले रेट लागू किए गए हैं। नोएडा प्राधिकरण के पूर्व फाइनेंस कंट्रोलर आर,,एस. कालरा ने बताया कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में पांच रेगुलेशन और तीन रूल्स को लागू करने की सिफारिश की थी। इसे दो फरवरी 2014 को बोर्ड ने मंजूरी भी दे दी थी। इसके बाद शासन में भेज कर इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया। इसे पिछले सात साल से लागू होने का इंतजार है।
उन्होंने नोएडा खबर डॉट कॉम को जानकारी दी कि एकाउंटिंग सिस्टम, मीटिंग के रेगुलेशन लागू करने को कहा गया था। इनमें सबसे अहम  बिल्डर व प्राधिकरण के बीच होने वाली लीज डीड एग्रीमेंट के लिए एक रूल्स बनाना था। इसमें एफएआर में बार-बार बदलाव की गुंजाइश नहीं होती। जैसे नोएडा प्राधिकरण ने सेक्टर 75 का  आवंटन करते समय उसको खरीदने वाले की अहर्ता नहीं देखी बल्कि प्रभावी देखकर आवंटन कर दिया और उसमें यह नियम शामिल कर दिया कि 25 प्रतिशत रखकर मूल कंपनी बाकी 75 प्रतिशत को किसी को भी बेच सकती है। इसका असर यह हुआ कि पूरा सेक्टर 4 हिस्सों में बांटकर पहले आवंटन कराने वाला बिल्डर अपना मुनाफा कमाकर बाहर हो गया और बाकी बिल्डर ऐसे थे जो प्रापर्टी डीलर की तरह के थे लिहाजा कई प्रोजेक्ट आज भी अधर में है। इसी तरह नोएडा ने जैसे वर्ष 2008 में जो स्कीम लांच की थी उसमें बिल्डरों को दो साल तक कोई भी राशि जमा ना करने की सुविधा दी थी। बाद में वह सुविधा वापस ले ली गई। ऐसे ही कई  कमर्शियल प्लॉट के आवंटन में लीज रेंट की दर घटाकर एक साल बाद फिर बढ़ा दी गई। नोएडा प्राधिकरण के अपने रूल्स व रेगुलेशन क्यों नहींं है यह सवाल अहम पैदा हो रहा है। सरकार ने सात साल बाद भी उस रिपोर्ट को मंजूरी क्यों नहीं दी जो अनियमितता रोकने के लिए बनी थी।
( नोएडा खबर डॉट कॉम के लिए विशेष रिपोर्ट)

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