स्पेशल स्टोरी : फ़िल्म अभिनेत्री जया बच्चन की इच्छा, निभाना चाहती है बेगम समरू की भूमिका, चांदनी चौक की तवायफ से लेकर सरधना की सल्तनत संभालने वाली बेगम

नोएडा/ मेरठ, 3 जून।
जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री व सांसद जया बच्चन की इच्छा है कि वह बेगम समरू का रोल निभाना चाहती है यह इच्छा उन्होंने नोएडा में फिल्म सिटी के निरीक्षण के दौरान एक इंटरव्यू देते समय जाहिर की थी उस समय उनके साथ जाने वाले फिल्म निर्माता निर्देशक गोविंद निहलानी भी थे। वे उस समय उत्तर प्रदेश फ़िल्म परिषद की अध्यक्ष के रूप में आई थी। तब मैंने अपने समाचार पत्र में उनका यह इंटरव्यू प्रकाशित किया था इस इंटरव्यू को ध्यान में रखते हुए मैंने बेगम समरू की कहानी के इतिहास को खंगालने की कोशिश की और अध्ययन कर पाया कि यह बड़ी दिलचस्प कहानी है। इस पर बनने वाली फिल्म जरूर हिट होगी।
इस फिल्म के लिए जया बच्चन अभी भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाने को तैयार हैं आज आपको नोएडा खबर के माध्यम से मैं विनोद शर्मा बेगम समरू के तथ्यात्मक और ऐतिहासिक जीवन के रहस्य लिख रहा हूं। पढ़िए यह बेगम समरू की दिलचस्प कहानी जिसका नाता सहारनपुर से लेकर अलीगढ़ के टप्पल तक है जिसमें आज का नोएडा भी आता था।
चांदनी चौक की तवायफ से लेकर सरधना की सल्तनत तक
बेगम समरू (1750-1836) भारतीय इतिहास की एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी असाधारण यात्रा से सामाजिक और सांस्कृतिक रूढ़ियों को चुनौती दी। उनकी कहानी दिल्ली के चांदनी चौक के कोठे से शुरू होकर मेरठ के निकट सरधना की सल्तनत की जागीरदार तक पहुंची, जो उनकी बुद्धिमत्ता, साहस और कूटनीति का प्रमाण है।
प्रारंभिक जीवन
बेगम समरू का जन्म फरज़ाना के रूप में हुआ था। उनके जन्म को लेकर दो दावे हैं: एक के अनुसार, वे मेरठ में एक गरीब परिवार में पैदा हुईं; दूसरे के अनुसार, उनका कश्मीरी वंश था। किशोरावस्था में वे दिल्ली के चावड़ी बाजार के रेडलाइट एरिया में एक तवायफ के रूप में काम करने लगीं। उस दौर में तवायफें न केवल नर्तकियां थीं, बल्कि स्वतंत्र विचारों वाली, कला और संस्कृति में निपुण महिलाएं मानी जाती थीं, जिनके पास दौलत और रुतबा दोनों होता था।

16 वर्ष की उम्र में जर्मन मूल के भाड़े के सैनिक से रचाई शादी
1767 में, जब फरज़ाना लगभग 16 वर्ष की थीं, उनकी मुलाकात जर्मन मूल के भाड़े के सैनिक वॉल्टर रेनहार्ड सोम्ब्रे से हुई। सोम्ब्रे, जिन्हें बाद में समरू कहा गया, चांदनी चौक के एक कोठे पर फरज़ाना के कथक नृत्य और मीरा के भजन “नहिं ऐसो जनम बारंबार” से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने फरज़ाना से विवाह कर लिया। यहीं से फरज़ाना की जिंदगी ने नया मोड़ लिया, और वे बेगम समरू बन गईं।

सरधना की जागीरदार
वॉल्टर रेनहार्ड सोम्ब्रे एक कुशल योद्धा थे, जिन्होंने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की सेवा की। उनकी वीरता के लिए उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सरधना से लेकर अलीगढ़ के टप्पल तक की जागीर दी गई। 1778 में वॉल्टर की मृत्यु के बाद, फरज़ाना ने उनकी विरासत को संभाला। वॉल्टर के 82 यूरोपीय अधिकारियों और 4000 सैनिकों ने शाह आलम द्वितीय को याचिका देकर फरज़ाना को सरधना की जागीरदार बनाने की मांग की। इस तरह, फरज़ाना बेगम समरू के रूप में सरधना की शासक बनीं।

सरधना की जागीर पर 48 वर्ष तक काबिज रही
बेगम समरू ने 48 वर्षों तक (1778-1836) सरधना पर शासन किया। उनकी सेना, जिसमें चार फ्रांसीसी बटालियन शामिल थीं, ने मुगल साम्राज्य को मराठों, जाटों, सिखों और रोहिल्लों के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की। उनकी कूटनीति और युद्ध कौशल ने उन्हें मुगल बादशाह और समकालीन शक्तियों के बीच सम्मान दिलाया। उन्होंने अलीगढ़ से सहारनपुर तक अपने प्रभाव का विस्तार किया।

धर्म परिवर्तन और विरासत
वॉल्टर की मृत्यु के बाद, बेगम समरू ने उनके सम्मान में 1822 में सरधना में एक भव्य कैथोलिक चर्च, बेसिलिका ऑफ आवर लेडी ऑफ ग्रेसेस, बनवाया। उन्होंने अपने पति की याद में कैथोलिक ईसाई धर्म अपनाया और अपना नाम जोआना (स्थानीय भाषा में योहाना) रख लिया। यह चर्च आज भी उनकी वास्तुकला और साहस की कहानी का प्रतीक है।

बेगम समरू का प्रतीक है भगीरथ पैलेस
बेगम समरू ने दिल्ली के चांदनी चौक में एक शानदार हवेली भी बनवाई, जिसे बाद में भागीरथ पैलेस के नाम से जाना गया। यह हवेली मुगल और यूरोपीय वास्तुकला का मिश्रण थी, जहां मुगल और ब्रिटिश दोनों का आना-जाना था। उनकी मृत्यु के बाद 1836 में इस हवेली का गौरव कम हुआ, और इसे 1847 में उनके दत्तक पुत्र ने बेच दिया।

व्यक्तित्व और प्रभाव
बेगम समरू एक चतुर और साहसी नेता थीं। वे युद्धभूमि में पगड़ी पहनकर, तलवार लहराते हुए अपनी सेना का नेतृत्व करती थीं। उनकी कूटनीति ने मुगलों, मराठों और अंग्रेजों के बीच संतुलन बनाए रखा। इतिहासकार राजगोपाल सिंह वर्मा की पुस्तक “बेगम समरू का सच” में उनके जीवन को विस्तार से बताया गया है, जिसमें उनकी उदारता, सख्त मिजाज, और यतीमों के प्रति सहानुभूति का जिक्र है।
प्रेरणा की कहानी
बेगम समरू की कहानी एक तवायफ से योद्धा और शासक बनने की प्रेरणादायक गाथा है। उन्होंने 18वीं और 19वीं सदी के उत्तर भारत में अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से एक अमिट छाप छोड़ी। सरधना का बेसिलिका और चांदनी चौक की हवेली आज भी उनकी विरासत को जीवित रखते हैं। बेगम समरू न केवल भारत की एकमात्र कैथोलिक रानी थीं, बल्कि एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने अपने समय की हर चुनौती को पार किया।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *