नोएडा,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित स्थानीय कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने 2015 के चर्चित मोहम्मद अखलाक लिंचिंग केस में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की सरकारी याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने अभियोजन पक्ष की अर्जी को “आधारहीन और महत्वहीन” करार देते हुए निरस्त कर दिया और ट्रायल को तेज करने के निर्देश दिए, जिसमें डे-टू-डे सुनवाई शामिल है। अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को होगी।
पीड़ित परिवार के वकील यूसुफ सैफी ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पीड़ित पक्ष को न्याय की उम्मीद जगी है। उन्होंने बताया कि आरोप तय हो चुके हैं, चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और कोई ठोस आधार न होने के कारण याचिका खारिज हुई। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि CrPC की धारा 321 के तहत कोई वैध तथ्य या आधार नहीं दिया गया, जिस पर विचार किया जा सके। इस फैसले का मतलब है कि 2015 में गोमांस रखने की अफवाह पर भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए गए मोहम्मद अखलाक के मामले में आरोपियों पर मुकदमा जारी रहेगा। सभी आरोपी फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।
नवंबर 2025 में सरकार ने क्यों दाखिल की थी याचिका?
उत्तर प्रदेश सरकार ने नवंबर 2025 में CrPC की धारा 321 के तहत याचिका दाखिल की थी, जिसमें सामाजिक सद्भाव बहाल करने, गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभास और पुरानी दुश्मनी न होने जैसे आधार दिए गए थे। सरकार का तर्क था कि दोनों पक्ष (पीड़ित और आरोपी) एक ही गांव के हैं, इसलिए केस वापस लेकर सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार कर दिया और कहा कि इससे न्याय प्रक्रिया में बाधा आएगी। पीड़ित परिवार ने इस कदम का कड़ा विरोध किया था। अखलाक की पत्नी इकरामन ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी याचिका दाखिल कर सरकार के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें वापसी की प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की गई है।
सीआरपीसी की धारा 321 क्या कहती है?
सीआरपीसी की धारा 321 पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को कोर्ट की सहमति से मुकदमा वापस लेने की अनुमति देती है। लेकिन कोर्ट को यह जांचना होता है कि वापसी सार्वजनिक हित में है या नहीं, और इससे न्याय में कोई गड़बड़ी तो नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट है कि सरकारी निर्देश से बंधा हुआ नहीं होना चाहिए; प्रॉसिक्यूटर और कोर्ट को स्वतंत्र रूप से विचार करना जरूरी है। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं था।
बैकग्राउंड: 2015 की वह भयावह रात
28 सितंबर 2015 को ग्रेटर नोएडा के दादरी क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव में 52 वर्षीय मोहम्मद अखलाक की घर में गोमांस रखने की अफवाह पर भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। उनके बेटे दानिश को भी गंभीर चोटें आईं। मंदिर से ऐलान के बाद जुटी भीड़ ने अखलाक और दानिश को घर से घसीटा और हमला किया। अखलाक की मौत हो गई, जबकि दानिश बच गए।फॉरेंसिक रिपोर्ट में मांस मटन का निकला, लेकिन अफवाहों ने मामले को सांप्रदायिक रंग दे दिया। इस घटना ने पूरे देश में गौ-रक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की बहस छेड़ दी और व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। पुलिस ने 18 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें नाबालिग भी शामिल थे। चार्जशीट में हत्या, दंगा और अन्य धाराओं के तहत केस दर्ज हुआ। एक आरोपी की मौत हो चुकी है, बाकी जमानत पर हैं।यह मामला दस साल से कोर्ट में लंबित था और धीमी गति से चल रहा था। सरकार की वापसी की कोशिश को कई लोग सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर राजनीतिक कदम मान रहे थे, लेकिन कोर्ट के फैसले ने न्याय प्रक्रिया को मजबूत किया है। पीड़ित परिवार अब पूरी उम्मीद से ट्रायल का इंतजार कर रहा है।
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