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बंगाल की हार से विपक्ष लें सीख-दीपक विग

बंगाल में ममता बनर्जी की हार से विपक्ष को गंभीर सबक लेना चाहिए। अब केवल कोर वोटर के भरोसे राजनीति नहीं चल सकती। बीजेपी को पहले ब्राह्मण-बनिया की पार्टी माना जाता था। हरियाणा, हिमाचल, पंजाब, दिल्ली-एनसीआर और उत्तर प्रदेश में पंजाबी हिंदू वोटर कांग्रेस के बाद बीजेपी को देते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि बीजेपी अकेले अपने दम पर सरकार नहीं बना पा रही है, तो 1998-99 के चुनावों में बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को जोड़ने की कोशिश की। इससे उनकी सीटें बढ़ीं और गठबंधन की सरकार बनी।

दो बार हारने के बाद बीजेपी ने खासतौर पर उत्तर भारत और महाराष्ट्र में जाटव (चमार) सहित सभी दलित वर्गों को जोड़ने का अभियान चलाया। 2014 में जीतने के बाद यादवों सहित सभी ओबीसी वर्गों को जोड़ने पर युद्ध स्तर पर काम किया। मुस्लिमों में शिया समुदाय और मुस्लिम महिलाओं को जोड़ने की कोशिश की। शियाओं को यकीन दिलाया कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान की तुलना में भारत में वे ज्यादा सुरक्षित हैं। 2019 के बाद पसमांदा मुस्लिमों को भी जोड़ने का प्रयास तेज किया गया। इन्हीं विस्तारित सामाजिक समीकरणों के कारण बीजेपी तीन लोकसभा चुनाव भारी विरोधी लहर के बावजूद जीतने में सफल रही।विपक्ष को अब क्या करना चाहिए?

विपक्ष को तालाब का मेंढक बनकर नहीं रहना चाहिए। उसे बीजेपी की इस रणनीति से सीख लेते हुए केवल कोर वोटर, केवल दलित, केवल मुस्लिम, केवल जाट, यादव या मराठा की राजनीति छोड़नी होगी। बीजेपी के कोर वोटर को छोड़कर 90-95% बल्कि अगर संभव हो तो 100% की राजनीति करनी चाहिए। अल्पसंख्यकों, किसी खास जाति, भाषा या क्षेत्र के पक्ष या विपक्ष में ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए जो तुष्टिकरण लगे। क्योंकि ऐसा करने से उसके विरोध में ध्रुवीकरण होगा और अंत में बीजेपी को फायदा पहुंचेगा।

अभी सबसे महत्वपूर्ण चुनाव उत्तर प्रदेश का है

आने वाला मुख्य मुकाबला उत्तर प्रदेश का है, जहां सपा और बीजेपी के बीच सीधा संघर्ष है। कांग्रेस, बसपा, आरएलडी, आप जैसी पार्टियां अभी भी केवल मुस्लिम, दलित, जाट आदि को साधने में लगी हैं, जिनका कुल वोट मात्र 25-30% है। केवल 25-30% वोटों के लिए लड़ने वाली पार्टियां कैसे जीत सकती हैं? क्योंकि ये वोट भी सपा और बीजेपी के बीच बंट जाते हैं।बीजेपी 80-85% वोटों के लिए लड़ रही है (हिंदू + थोड़ा अल्पसंख्यक), जबकि सपा पीडीए (पीड़ित, दुखी, अगड़ा/सवर्ण + आधी आबादी + पीड़ित अति पिछड़ा + दुखी अल्पसंख्यक + पीड़ित दलित) फॉर्मूले के साथ 90-95% वोटों के लिए लड़ रही है। 2017 में सपा को 45 सीटें मिलीं, 2022 में 125 और 2024 लोकसभा में 37 सीटें मिलीं। पार्टी लगातार बढ़ रही है, लेकिन अब कुछ जरूरी सुधार करने होंगे:

  • नेताओं और पदाधिकारियों को विवादित बयानों से रोकना होगा।
  • कांग्रेस के साथ गठबंधन पर 75-328 का फॉर्मूला तय करना चाहिए।
  • चेहरे की लड़ाई होगी — योगी बनाम अखिलेश। इसलिए विकास की छवि रखनी होगी।
  • 65-70 शहरी सीटों पर खत्री, कायस्थ, ब्राह्मण, बनिया उम्मीदवारों को टिकट देना चाहिए।
  • सबसे महत्वपूर्ण — ऐसा कोई काम या बयान नहीं होना चाहिए जिससे ध्रुवीकरण हो।
लेखक: राजनीतिक एवं सामाजिक विचारक
चेयरमैन, पंजाबी विकास मंच
पूर्व महानगर अध्यक्ष, सपा, नोएडा

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