गौतमबुद्धनगर,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने हिण्डन नदी के डूब क्षेत्र में फैले अवैध निर्माणों पर सख्त चेतावनी जारी की है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ ‘बाढ़ आई तो मदद नहीं करेंगे’ कहकर विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है? जबकि एनजीटी के पुराने आदेशों और शासनादेशों के बावजूद अवैध स्कूल, फार्म हाउस, क्रशर प्लांट, होट मिक्स प्लांट और कंक्रीट प्लांट लगातार खड़े हो रहे हैं।
अधिशासी अभियंता, सिंचाई निर्माण खंड गाजियाबाद की और से बुधवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट कहा गया है कि ग्राम छजारसी, चोटपुर, यूसुफपुर, चकशाहबेरी, बहलोलपुर, गढ़ी चौखंडी, हैबतपुर, परथला, खंजरपुर, सौरखा, जाहीदाबाद, ककराला, अलावर्दीपुर, जलपुरा, हल्दोनी, कुलेसरा, इलाहावास, सूथियाना, शहदरा, लखनावली, बेगमपुर, मुबारकपुर, गुर्जरपुर, झट्टा, बादौली बांगर, तुगलपुर, कोंडली बांगर, शफीपुर, चुहडपुर, मोमनाथल, मोतीपुर, तिलवाड़ा, गढ़ी समस्तीपुर, बादौली खादर, कोंडली खादर, कामबक्शपुर, गुलावली, दोस्तपुर, मंगरौली, छपरौली, असदुल्लापुर, औरंगाबाद, दलेलपुर और याकूतपुर (हरियाणा साइड) सहित हिण्डन-यमुना दोआब क्षेत्र में बने या बन रहे सभी निर्माण पूरी तरह अवैध हैं।
विभाग का कहना है कि बाढ़ के समय इन निर्माणों से नदी की धारा में अवरोध पैदा होगा, जिससे भारी जन-धन हानि हो सकती है। ऐसे में सिंचाई विभाग, जिला प्रशासन या शासन कोई सुरक्षा या बचाव कार्य नहीं करेगा। 16 मार्च 2010 के शासनादेश संख्या-1417 और एनजीटी के 20 मई 2013 के आदेश (एप्लीकेशन नंबर-89/2013, आकाश वशिष्ठ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) का हवाला देते हुए विभाग ने साफ कर दिया कि अवैध निर्माण से होने वाली कोई भी क्षति की भरपाई शासन नहीं करेगा। उल्टा, क्षति की वसूली निर्माणकर्ताओं से की जाएगी।
सवाल कार्रवाई की कमी का
यह प्रेस विज्ञप्ति विभाग की निष्क्रियता को उजागर करती है। पिछले वर्षों में ग्रेटर नोएडा और नोएडा प्राधिकरण ने एनजीटी के दबाव में कुछ स्थानों (जैसे हैबतपुर, शफीपुर) पर बुलडोजर चलाए, लेकिन बड़े पैमाने पर अतिक्रमण अभी भी जारी है। क्रशर प्लांट, रेडी मिक्स प्लांट और फार्म हाउस जैसे बड़े-बड़े निर्माण आसानी से खड़े हो रहे हैं। विभाग की रणनीति अब ‘चेतावनी जारी कर जिम्मेदारी से मुक्त होना’ वाली हो गई है।
क्या यह तरीका सही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि नहीं।
बाढ़ प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार, डूब क्षेत्र में निर्माण रोकने के लिए सख्त कानूनी कार्रवाई, नियमित निगरानी और तत्काल तोड़-फोड़ जरूरी है, न कि सिर्फ चेतावनी। एनजीटी ने 2013 में ही यमुना-हिण्डन के फ्लड प्लेन पर सभी अवैध निर्माण हटाने के आदेश दिए थे, फिर भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
आम लोगों पर क्या असर?
स्थानीय निवासियों और खरीदारों में आक्रोश है। कई लोग कॉलोनाइजरों से प्लॉट खरीदकर घर बना चुके हैं, जिन्हें अब बाढ़ का खतरा बताया जा रहा है। विभाग कह रहा है कि बाढ़ में कोई मदद नहीं मिलेगी, तो जिम्मेदारी किसकी?
प्रशासन की नाकामी या भू-माफियाओं की मिलीभगत?
सिंचाई विभाग का यह नया ‘डिस्क्लेमर’ तरीका शायद कानूनी रूप से सही हो, लेकिन नैतिक और व्यावहारिक रूप से कमजोर है। बाढ़ आने पर अगर जान-माल का नुकसान होता है तो सिर्फ निर्माणकर्ता को दोषी ठहराना आसान है, लेकिन रोकथाम की जिम्मेदारी तो सरकार की ही है।
सिंचाई विभाग ने चेतावनी तो दे दी, लेकिन असली सवाल यह है कि अवैध निर्माण क्यों जारी हैं? क्या बुलडोजर अभियान तेज किए जाएंगे या फिर हर बाढ़ के बाद ‘हमने तो चेताया था’ कहकर पल्ला झाड़ लिया जाएगा? गौतमबुद्धनगर के डूब क्षेत्र के हजारों निवासियों की जान और लाखों की संपत्ति इस सवाल का जवाब तय करेगी।
