-गौतम बुद्ध नगर लोकसभा क्षेत्र की अनसुनी प्रतिभा “जगदीश चंद्र माथुर”
विनोद शर्मा
नई दिल्ली/खुर्जा(नोएडा खबर डॉट कॉम)
जब भी रेडियो पर “यह आकाशवाणी है…” गूंजती है या दूरदर्शन का लोगो स्क्रीन पर आता है, तब गौतम बुद्ध नगर के खुर्जा की धरती का एक सपूत चुपके से याद आ जाता है। जगदीश चंद्र माथुर — वह दूरदर्शी साहित्यकार, प्रशासक और सांस्कृतिक चिंतक, जिन्होंने स्वतंत्र भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान दी।
16 जुलाई 1917 को खुर्जा के निकट एक छोटे से गांव में जन्मे जगदीश चंद्र माथुर ने मात्र 12 वर्ष की आयु में अपना पहला प्रहसन ‘मूर्खेश्वर राजा’ लिखकर प्रतिभा का परिचय दिया। आईसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रशासनिक सेवा में आने के बावजूद उन्होंने साहित्य और रंगमंच को कभी नहीं छोड़ा।
1955 में ऑल इंडिया रेडियो के महानिदेशक के रूप में नियुक्ति के बाद उन्होंने औपनिवेशिक नाम को त्यागकर ‘आकाशवाणी’ शब्द गढ़ा। चार वर्ष बाद 1959 में टेलीविजन प्रसारण शुरू होते ही उन्होंने इसे ‘दूरदर्शन’ नाम दिया। दोनों नाम आज भी भारतीय जनमानस की स्मृति और गर्व से जुड़े हैं।
माथुर जी ने रेडियो को मात्र समाचार माध्यम नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति का विश्वविद्यालय बनाया। दिनकर, पंत, नवीन और कमलेश्वर जैसे साहित्यकारों को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। उनका नाटक ‘कोणार्क’ आज भी हिंदी रंगमंच का क्लासिक माना जाता है। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की कार्यकारिणी का नेतृत्व किया, संगीत नाटक अकादमी के संस्थापक सदस्य रहे और लोक संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।ग्रामीण विकास, वयस्क शिक्षा और जनसंचार के क्षेत्र में उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को और हार्वर्ड विश्वविद्यालय जैसे मंचों पर उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया।14 मई 1978 को निधन के बाद भी उनकी सांस्कृतिक देन जीवित है। आज जब नई पीढ़ी इन नामों को रोज सुनती है, तब शायद ही जानती हो कि ये शब्द गौतम बुद्ध नगर के खुर्जा की मिट्टी से निकली उस प्रतिभा की अमर विरासत हैं।एक व्यक्ति, एक दूरदृष्टि और दो शब्दों ने पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक आवाज़ को नई पहचान दी।
