संघर्ष की अनोखी मिसाल: संत बनकर भी नहीं छोड़ी कानूनी लड़ाई, 26 साल बाद फिर पहनी वो वर्दी जो छिन गई थी

विनोद शर्मा
नई दिल्ली,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
सीआरपीएफ के बर्खास्त हवलदार गिरवर सिंह तोमर (अब गिरवर दास महाराज) की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी है। 26-27 साल तक वर्दी से दूर रहने के बाद वे फिर देश की सेवा में लौट आए हैं।

मुरैना (मध्य प्रदेश) के छिछावली गांव के रहने वाले गिरवर सिंह तोमर का बचपन से ही फौज में जाने का सपना था। 1991 में कड़ी मेहनत के बाद वे सीआरपीएफ में हवलदार के पद पर भर्ती हुए। करीब आठ-नौ साल तक उन्होंने सेवा की।

आसाम में तैनाती के दौरान 1999 में एक छोटे से विवाद ने उनकी जिंदगी बदल दी।एक दिन बाजार से खाना लेकर लौटते समय उनके वाहन से एक साइकिल टकरा गई। गिरवर सिंह का कहना है कि साइकिल किसी नागरिक की थी और उन्होंने मामले की रिपोर्ट अधिकारी को दी। आरोप लगा कि उनकी साइकिल अधिकारी के वाहन से टकराई। जब उन्होंने आरोप से इनकार किया तो मामला और बिगड़ गया। विभागीय जांच के बाद 21 अक्टूबर 1999 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

जीने लगे संत की जिंदगी

नौकरी छूटने के बाद वे मानसिक रूप से टूट गए। कुछ समय परिवार के साथ रहने के बाद उन्होंने गांव के पास बारहद्वारी मंदिर और फिर गुफा मंदिर में रहना शुरू कर दिया। 2001 तक वे निर्मोही अखाड़े से जुड़ गए और संत गिरवर दास महाराज के नाम से जाने जाने लगे। उन्होंने पीले वस्त्र धारण किए, लंबे बाल और सफेद दाढ़ी रखी। प्रयागराज और चित्रकूट के मंदिरों में भी समय बिताया। गुरु के कहने पर संतों की सेवा करते हुए उन्होंने 26 साल बिताए, लेकिन इंसाफ की लड़ाई नहीं छोड़ी।

जीती कानूनी जंग और फिर पहन ली वर्दी

1999 में ही उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। 2007 में कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन सीआरपीएफ ने स्टे ले लिया। मामला डबल बेंच तक गया। 28 अगस्त 2025 को कोर्ट ने सीआरपीएफ को तीन महीने के अंदर उन्हें बहाल करने का आदेश दिया। आदेश लागू न होने पर उन्होंने फिर कानूनी कदम उठाए। आखिरकार 26 अगस्त 2026 को सीआरपीएफ ने बहाली का आदेश जारी किया।

ट्रेन पकड़ी, दाढ़ी कटवाई और फिर हुई तैनाती

54 साल की उम्र में गिरवर सिंह ने मुरैना से बीजापुर (छत्तीसगढ़) की ट्रेन पकड़ी। वहां पहुंचकर सबसे पहले नाई की दुकान पर गए, लंबे बाल कटवाए और दाढ़ी मुंडवाई। उसी दिन दोपहर तक उन्होंने सीआरपीएफ की 85वीं बटालियन में वर्दी पहन ली। अब वे कांस्टेबल के पद पर हैं (बहाली प्रक्रिया के अनुसार) और हवलदार बनने के लिए कोर्स पूरा करेंगे। 2030 में रिटायरमेंट है।

गिरवर सिंह कहते हैं, “यह सब भगवान की कृपा है। लगता है घर वापस आ गया हूं।” बटालियन में पुराने साथी कम हैं, लेकिन नए साथी उनका स्वागत कर रहे हैं। संत जीवन के बावजूद उनकी आध्यात्मिक आस्था बरकरार है। उनकी दो बेटियां शादीशुदा हैं और बेटा अग्निवीर के रूप में सेवा कर रहा है।

यह कहानी सिर्फ नौकरी वापसी की नहीं, बल्कि धैर्य, जुनून और विश्वास की है। एक छोटी सी घटना ने वर्दी छीन ली, संत जीवन ने उन्हें संभाला और अदालत ने 27 साल बाद न्याय दिलाया। अब वे फिर देश की सेवा में खड़े हैं।

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