विनोद शर्मा
नई दिल्ली,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
ग्वालियर के पास करैया भितरवार के एक युवा के सामने दो रास्ते थे। एक था कॉलेज की नौकरी, दूसरा था गाना। साधु सुशील तिवारी ने दोनों को छुआ, लेकिन दिल एक ही जगह रहा।
साइंस कॉलेज से स्नातक, फिर स्नातकोत्तर। कुछ समय निजी महाविद्यालयों में अतिथि शिक्षक भी रहे। परिवार और समाज की निगाह में यह सुरक्षित रास्ता था। लेकिन शामें संजय देवले जैसे शास्त्रीय गायक के पास बीतती थीं। सुर साधना थी, स्टार बनने की हड़बड़ी नहीं।मुंबई आए तो बड़े बैनर और चमकदार स्टूडियो का इंतजार नहीं मिला। छोटे गाने, छोटे प्रोजेक्ट—जीना भूल जाऊँगा, किसको था पता, एक फिल्म में ओम शब्द। पहचान धीरे-धीरे बनी, शोर नहीं मचा।
फिर हनुमान अंश आई। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी को बड़े नाम नहीं, वो आवाज़ चाहिए थी जो मंदिर, गाँव और भक्ति से निकली हो। साधु तिवारी सिर्फ गायक नहीं थे। वे लिख भी सकते थे, धुन भी बना सकते थे। सो पाँच गीत उन्हीं के हुए—आवागमन, सासा हाले, पार्वती, हे खरारी और बजरंग बांका।यहीं उनकी जिद काम आई। पार्वती में सप्तऋषि माँ पार्वती से कहते हैं कि शिव के शीश पर गंगा है, गले में सर्प हैं, घर-गृहस्थी क्या जानें। यह बॉलीवुड का प्रेम गीत नहीं, लोक कथा का स्वाद है। आवागमन में भक्त कहता है—दुनिया छलावा है, आवागमन मिटा दो भोले। कम बजट की फिल्म में ये गाने महंगे इफेक्ट से नहीं, सादे सुर से बैठे।
फिल्म पहले दिन दस लाख पर खुली, फिर दर्शक उठाकर ले गए। गाने रील्स पर चले, मंदिरों में गूँजे। ग्वालियर और गुना में लोग उन्हीं को सुनने लगे, जिनकी आवाज़ कभी कक्षा और छोटे स्टूडियो तक सीमित थी। वे खुद कहते हैं—यकीन नहीं होता कि फिल्म इतनी चलेगी।उनकी कहानी यही सिखाती है। पहले सुरक्षित नौकरी, फिर अधूरा मुंबई, फिर एक ऐसी फिल्म जिसमें लोक भक्ति को मुख्य किरदार बनाया गया।
सफलता रातोंरात नहीं आई। आई तब, जब उन्होंने वो गाया जो वे सच में जानते थे—मिट्टी की भाषा, शिव-हनुमान की भक्ति, और बिना दिखावे का सुर।आज हनुमान अंश के पीछे डॉक्टर-निर्देशक की जिद है, तो उसके गानों के पीछे एक शिक्षक-गायक की साधना भी है। करैया से निकली आवाज़ अब उन पर्दों पर है, जहाँ लोग आँख बंद करके सुन रहे हैं।
