विनोद शर्मा, नोएडा।(नोएडा खबर डॉट कॉम)
कभी-कभी शहर सिर्फ सड़कों और टावरों से नहीं बनता। वह उन लोगों से बनता है, जो नदी के किनारे खड़े होकर कहते हैं—यह पानी हमारा है, यह किनारा हमारा है, और इस शहर की आस्था भी हमारी जिम्मेदारी है।24 नवंबर 2026 को नोएडा में वाराणसी की तर्ज पर देव दीपावली मनाने की तैयारी चल रही है।
कार्तिक पूर्णिमा की उसी रात, जब काशी के घाट दीपों से जगमगाते हैं, नोएडा के यमुना तट पर भी हजारों दीप जलाने की योजना है। आयोजकों का कहना है कि पिछले वर्ष भी यह प्रयास हुआ था, इस बार लक्ष्य और बड़ा है—ऐतिहासिक आयोजन। YSS, भारत विकास परिषद और अन्य सामाजिक संगठन तैयारियों में जुटे हैं।
इस कहानी का केंद्र कोई सरकारी आदेश नहीं, बल्कि एक साधारण-सी ठान है। सचिन गुप्ता, एन के अग्रवाल और सत्यनारायण गोयल समेत अन्य स्वयं सेवकों ने सोचा कि यमुना को सिर्फ प्रदूषण की खबरों में क्यों देखा जाए। अगर काशी गंगा को दीपों से नमन कर सकती है, तो नोएडा अपनी यमुना को क्यों नहीं याद कर सकता।
इसी सोच से एक अनूठी मुहिम शुरू हुई—नदी को सजाने की नहीं, नदी से फिर जुड़ने की।मुहिम आसान नहीं थी। किनारे की सफाई, दीपों की व्यवस्था, स्वयंसेवकों का तालमेल, परिवारों को जोड़ना—सब कुछ धीरे-धीरे बना। कुछ लोगों ने कहा, “यमुना अब वैसी नहीं रही।” उत्तर सरल था—“तो पहले दीप जलाओ, फिर स्वरूप लौटेगा।” एक दीप से दस, दस से सौ, और फिर हजारों हाथ जुड़ने लगे। बच्चे दीप सजाने लगे, महिलाएं मां यमुना की आरती की तैयारी करने लगीं, युवा घाट की सफाई में लग गए।
यह आयोजन महज पर्व नहीं बन रहा। यह संदेश बन रहा है कि विकास सिर्फ कंक्रीट नहीं होता। विकास तब भी होता है, जब कोई शहर अपनी नदी को शर्मिंदगी नहीं, सम्मान देना सीखता है। जब दीप जलेंगे, तो रोशनी सिर्फ पानी पर नहीं गिरेगी। वह उन लोगों पर भी गिरेगी, जिन्होंने शिकायत करने की जगह काम करना चुना।
24 नवंबर की रात अगर योजना के अनुसार यमुना तट दीपों से भर गया, तो वह सिर्फ त्योहार की तस्वीर नहीं होगी। वह एक प्रेरणा होगी—कि बड़े परिवर्तन अक्सर बड़े बजट से नहीं, कुछ दृढ़ लोगों की छोटी शुरुआत से होते हैं। सचिन गुप्ता, सत्यनारायण गोयल और एन के अग्रवाल और उनके साथ जुड़े संगठन अगर इस रात को ऐतिहासिक बना सके, तो नोएडा को एक नई पहचान मिलेगी:
यहां सिर्फ शहर बसता है, यहां नदी भी फिर से जीती है।
