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आज़ादी के मतवाले -वीरांगना अहिल्याबाई होल्कर की वीरगाथा

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– 75 आज़ादी का अमृत महोत्सव-

बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार, समाज-सेवा, लोगों के आर्थिक स्वावलंबन, गुमनाम क्रांतिकारियों एवं स्वतंत्रता सेनानियों पर शोध एवं उनके सम्मान के लिए समर्पित मातृभूमि सेवा संस्था, आज देश के ज्ञात एवं अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को उनके अवतरण, स्वर्गारोहण तथा बलिदान दिवस पर, उनके द्वारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए अद्भूत एवं अविस्मरणीय योगदान के सम्मान में नतमस्तक है।

रानी आहिल्याबाई होल्कर जी
जन्म : 31.05.1725  निधन : 31.08.1795

राष्ट्रभक्त साथियों, देवी अहिल्याबाई होल्कर जी एक महान शासिका एवं मालवा प्रांत की महारानी थीं। लोग उन्हें लोकमाता अहिल्यादेवी होल्कर जी के नाम से भी जानते हैं और उनका जन्म महाराष्ट्र के चांड़ी गाँव में 31.05.1725 में हुआ था। उनके पिता मानकोजीराव शिंदे धनगर समाज से थे, जो गाँव के पाटिल की भूमिका निभाते थे। उनके पिता ने अहिल्याबाई जी को पढ़ाया-लिखाया। इनका जीवन भी बहुत साधारण तरीके से गुजर रहा था, लेकिन एकाएक भाग्य ने पलटी खाई और वह 18वीं सदी में मालवा प्रांत की रानी बन गईं। महारानी अहिल्यादेवी जी का चरित्र और सरलता ने मल्हार राव होल्कर को प्रभावित किया। वे पेशवा बाजीराव की सेना में एक कमांडर के तौर पर काम करते थे। उन्हें अहिल्या जी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने उनकी शादी अपने बेटे खांडेराव से करा ली। इस तरह अहिल्या बाई एक दुल्हन के तौर पर मराठा समुदाय के होल्कर राजघराने में पहुँची। सन् 1754 में रानी अहिल्याबाई होल्कर जी के पति खांडेराव होल्कर जी की कुंभेर की लड़ाई में मौत हो गई। ऐसे में रानी अहिल्याबाई होल्कर जी पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपने ससुर के कहने पर न केवल सैन्य मामलों में बल्कि प्रशासनिक मामलों में भी रुचि दिखाई और प्रभावी तरीके से उन्हें अंजाम दिया।

मल्हारराव के निधन के बाद रानी अहिल्याबाई होलकर जी ने पेशवाओं की गद्दी से आग्रह किया कि उन्हें क्षेत्र की प्रशासनिक बागडोर सौंपी जाए। मंजूरी मिलने के बाद सन् 1766 में रानी अहिल्यादेवी मालवा की शासक बन गईं। रानी अहिल्याबाई जी ने तुकोजी होल्कर को सैन्य कमांडर बनाया। उन्हें उनकी राजसी सेना का पूरा सहयोग मिला। अहिल्याबाई जी ने कई युद्ध का नेतृत्व किया। वे एक साहसी योद्धा थी और बेहतरीन तीरंदाज। हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थी। हमेशा आक्रमण करने को तत्पर भील और गोंड्स से उन्होंने कई बरसों तक अपने राज्य को सुरक्षित रखा। रानी अहिल्याबाई जी अपनी राजधानी महेश्वर ले गईं। वहाँ उन्होंने 18वीं सदी का बेहतरीन और आलीशान अहिल्या महल बनवाया। पवित्र नर्मदा नदी के किनारे बनाए गए इस महल के ईर्द-गिर्द बनी राजधानी की पहचान बनी टेक्सटाइल इंडस्ट्री। उस दौरान महेश्वर साहित्य, मूर्तिकला, संगीत और कला के क्षेत्र में एक गढ़ बन चुका था। मराठी कवि मोरोपंत, शाहिर, अनंतफंडी और संस्कृत विद्वान खुलासी राम उनके कालखंड के महान व्यक्तित्व थे। महारानी अहिल्याबाई होल्कर जी को एक बुद्धिमान, तीक्ष्ण सोच और स्वस्फूर्त शासक के तौर पर याद किया जाता है। हर दिन वह अपनी प्रजा से बात करती थी। उनकी समस्याएँ सुनती थी। अपने कालखंड (1767-1795) में रानी अहिल्याबाई जी ने ऐसे कई काम किए कि लोग आज भी उनका नाम लेते हैं।

अपने साम्राज्य को रानी अहिल्याबाई होलकर जी ने समृद्ध बनाया। उन्होंने सरकारी पैसा बेहद बुद्धिमानी से कई किले, विश्राम गृह, कुएं और सड़कें बनवाने पर खर्च किया। वह लोगों के साथ त्योहार मनाती और हिंदू मंदिरों को दान देती। एक महिला होने के नाते उन्होंने विधवा महिलाओं को अपने पति की संपत्ति को हासिल करने और बेटे को गोद लेने में मदद की। इंदौर को एक छोटे-से गाँव से समृद्ध और सजीव शहर बनाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार किया। उनका सबसे यादगार काम रहा, तकरीबन सभी बड़े मंदिरों और तीर्थस्थलों पर निर्माण। हिमालय से लेकर दक्षिण भारत के कोने-कोने तक उन्होंने इस पर खूब पैसा खर्च किया। काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथ पुरी के ख्यात मंदिरों में उन्होंने खूब काम करवाए। अहिल्याबाई होल्कर जी का चमत्कृत कर देने वाले और अलंकृत शासन 13.08.1795 को खत्म हुआ, जब उनका निधन हुआ। उनकी महानता और सम्मान में भारत सरकार ने 25.08.1996 को उनकी याद में एक डाक टिकट जारी किया था।

मातृभूमि सेवा संस्था आज एक ऐसी बुद्धिजीवी, जनप्रिय, समाज सुधारक, साहसी, युद्धकौशल में निपुण देशभक्त रानी अहिल्याबाई होल्कर जी के 297वीं जयंती पर उन्हें कोटिश: नमन करती है।

राकेश कुमार
(मातृभूमि सेवा संस्था 9891960477 से साभार )

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