खास मुद्दा: यूजीसी के नए विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है? एक विश्लेषण

विनोद शर्मा

नई दिल्ली, (नोएडा खबर डॉट कॉम)

भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में हाल ही में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा जारी किए गए “प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026” (UGC Equity Regulations 2026) ने काफी विवाद खड़ा कर दिया है। यह विधेयक मुख्य रूप से उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, लिंग, धर्म, विकलांगता आदि आधार पर भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया है।

यूजीसी के अनुसार, 2019-20 से 2023-24 तक जाति-आधारित शिकायतों में 118% की वृद्धि हुई है, जिसके चलते ऐसे नियमों की जरूरत पड़ी।

इसमें संस्थानों को इक्विटी सेल, हेल्पलाइन, इक्विटी एंबेसडर और स्क्वॉड बनाने का आदेश दिया गया है, साथ ही भेदभाव साबित होने पर संस्थानों पर जुर्माना, फंडिंग कटौती या मान्यता रद्द करने जैसे दंड का प्रावधान है।

हालांकि, इस विधेयक का व्यापक विरोध हो रहा है, खासकर सामान्य श्रेणी (जनरल कैटेगरी) के छात्रों, शिक्षाविदों और राजनीतिक हलकों से। विरोध की मुख्य वजहें पक्षपातपूर्ण डिजाइन, संभावित दुरुपयोग और संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन हैं।

आइए इसे विस्तार से विश्लेषित करें:

1. पक्षपातपूर्ण परिभाषा और सामान्य श्रेणी की उपेक्षा
विधेयक में भेदभाव के पीड़ितों को मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) तक सीमित रखा गया है।
सामान्य श्रेणी के छात्रों को पीड़ित के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, जिससे उन्हें “स्वाभाविक अपराधी” के रूप में चित्रित किया जा रहा है। विरोधी इसे असंवैधानिक मानते हैं, क्योंकि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन करता है।

विश्लेषण:

यह दृष्टिकोण “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” को बढ़ावा दे सकता है, जहां सामान्य श्रेणी के छात्रों को भेदभाव का शिकार होने पर भी कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी। सोशल मीडिया पर #UGCRollback और #ShameOnUGC जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां यूजर्स इसे “सामान्य श्रेणी के खिलाफ युद्ध” बता रहे हैं। इससे कैंपस में जातिगत तनाव बढ़ सकता है, जो पहले से ही संवेदनशील माहौल को और बिगाड़ेगा।

2. झूठी शिकायतों के लिए कोई सुरक्षा नहीं

नियमों में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ कोई दंड या सुरक्षा उपाय नहीं है।

शिकायतकर्ता की गोपनीयता बरकरार रखी जाती है, लेकिन आरोपी को खुला छोड़ दिया जाता है, जिससे आरोप लगाना आसान और बचाव मुश्किल हो जाता है।
विश्लेषण: विरोधी इसे “फिक्स्ड मैच” कहते हैं, जहां आरोप मात्र से ही सजा का खतरा मंडराता है।
इससे संस्थानों में राजनीतिक दुरुपयोग बढ़ सकता है, और मेरिट-आधारित सिस्टम प्रभावित होगा। कई यूजर्स इसे कांग्रेस के 2013 कम्युनल वायलेंस बिल से जोड़ते हैं, जो बहुसंख्यकों को दोषी मानता था।

BJP सरकार पर आरोप है कि वह कांग्रेस की नीतियों की नकल कर SC/ST वोट बैंक को लुभा रही है, जबकि सामान्य श्रेणी को बलि का बकरा बना रही है।

3. नौकरशाही बढ़ोतरी और मेरिट का क्षरण

विधेयक में इक्विटी कमेटी, स्क्वॉड और एंबेसडर जैसे नए तंत्र बनाने का प्रावधान है, जो कैंपस पर निरंतर निगरानी करेंगे।

इसमें द्विवार्षिक रिपोर्ट और यूजीसी को वार्षिक रिपोर्ट भेजने की बाध्यता है, जो नौकरशाही को बढ़ाएगी।

विश्लेषण:

विरोधी इसे “पुलिस स्टेट” जैसा बताते हैं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हनन करता है।
इससे मेरिट-आधारित शिक्षा प्रभावित हो सकती है, और युवा प्रतिभाएं विदेश पलायन कर सकती हैं।
आधार के रूप में रोहित वेमुला केस का इस्तेमाल किया गया, जो पुलिस रिपोर्ट के अनुसार जाति भेदभाव पर आधारित नहीं था, बल्कि अवसाद से जुड़ा था।
फिर भी, इसे राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किया गया, जो नियमों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।

4. राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

विरोध मुख्य रूप से सामान्य श्रेणी के छात्रों से है, जो इसे BJP सरकार की “वोट बैंक पॉलिटिक्स” बताते हैं। शिवसेना (UBT) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे अस्पष्ट और पक्षपाती बताया है।

सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल हो चुकी है, और देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं।
विश्लेषण: उद्देश्य (भेदभाव रोकना) सराहनीय है, लेकिन कार्यान्वयन में bias इसे विफल बना सकता है। यह हिंदू एकता के दावों के विपरीत है, क्योंकि इससे हिंदू समाज में विभाजन बढ़ेगा।

कुछ विश्लेषक इसे SC/ST/OBC के खिलाफ भी बताते हैं, क्योंकि यह जातिगत उत्पीड़न को आर्थिक असमानता तक सीमित कर देता है। कुल मिलाकर, यह नियम समानता के बजाय असमानता को बढ़ावा दे सकता है, जिससे शिक्षा क्षेत्र में अस्थिरता आएगी।

यदि यूजीसी इसे वापस नहीं लेती या संशोधित नहीं करती, तो यह लंबे कानूनी विवाद का कारण बन सकता है। विरोध की तीव्रता से लगता है कि सरकार को जल्द संवाद शुरू करना चाहिए, अन्यथा यह युवाओं में असंतोष को बढ़ाएगा। अब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस मुद्दे पर नौकरी से त्यागपत्र देकर इस मामले को गम्भीर बना दिया है।

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