नई दिल्ली,(नोएडा खबर डॉट कॉम)
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ के खिलाफ विरोध अब भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर भी फैल गया है। इस बीच, जाने-माने कवि विनोद पाण्डेय ने एक गहन और विचारोत्तेजक प्रतिक्रिया साझा की है, जिसमें उन्होंने UGC नियमों को न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक संतुलन के नजरिए से परखा। उनकी यह प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और UGC विरोध के #UGC_RollBack ट्रेंड को नई ताकत दे रही है।
विनोद पाण्डेय ने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा:“मेरी दृष्टि में न्याय का अर्थ संतुलन है, पक्षपात नहीं। हाल के दिनों में उच्च शिक्षा से जुड़ी UGC नीतियों और नियमों को लेकर एक नई बहस समाज में खड़ी हो गई है। यह बहस आरक्षण के पक्ष या विपक्ष की नहीं है, बल्कि न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक संतुलन की है। विशेष रूप से सवर्ण छात्रों के मन में यह प्रश्न गहराता जा रहा है कि क्या उन्हें हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाना ही नियति है?
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम कानूनों को कठोर जरूर बनाएं, लेकिन अंधा नहीं। भेदभाव के खिलाफ लड़ाई जरूरी है, लेकिन उस लड़ाई में न्याय की आत्मा खोना खतरनाक होगा। क्योंकि अगर न्याय डर पैदा करने लगे, तो समाज सुधरता नहीं बल्कि टूट जाता है।”
यह संदेश UGC के नए नियमों के उन प्रावधानों पर सीधा प्रहार करता है, जिनमें इक्विटी कमेटी और जांच प्रक्रिया को लेकर संतुलन की कमी का आरोप लगाया जा रहा है। पाण्डेय ने स्पष्ट किया कि जातिगत असमानता को स्वीकार करते हुए भी वर्तमान पीढ़ी पर इतिहास की जिम्मेदारी थोपना गलत है। उन्होंने कानून के मूल सिद्धांत को दोहराया कि अपराध व्यक्ति करता है, वर्ग नहीं, और झूठे आरोपों से निर्दोष की रक्षा का प्रावधान अनिवार्य है।
UGC नियमों का विवाद क्या है?UGC ने 13-15 जनवरी 2026 से ये नियम लागू किए, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकना है।
प्रमुख प्रावधान:
हर संस्थान में इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वॉड का गठन (SC/ST/OBC/महिला/दिव्यांग प्रतिनिधि अनिवार्य)।
24×7 हेल्पलाइन, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और सख्त जांच।
उल्लंघन पर फंडिंग रोक या मान्यता रद्द।
विरोधी तर्क देते हैं कि ये नियम सवर्णों को पहले से अपराधी मानते हैं, झूठी शिकायतों का दुरुपयोग संभव है (झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान हटाया गया), और कमेटी में जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व नहीं।
सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल हो चुकी है, और कई जगह प्रदर्शन-इस्तीफे हो रहे हैं (जैसे बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री)।
विनोद पाण्डेय की आवाज क्यों मायने रखती है?
विनोद पाण्डेय जैसे कवि, जो समाज की गहराई को शब्दों में उकेरते हैं, इस बहस को भावनात्मक और दार्शनिक आयाम दे रहे हैं। उनकी यह प्रतिक्रिया कुमार विश्वास जैसी पिछली आवाजों के साथ जुड़कर UGC नियमों के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक-बौद्धिक आंदोलन का रूप ले रही है। सोशल मीडिया पर इसे हजारों शेयर मिल रहे हैं, और कई यूजर्स इसे “न्याय की सही परिभाषा” बता रहे हैं।
सरकार की ओर से स्पष्टीकरण आया है कि नियम निष्पक्ष होंगे, लेकिन विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा। क्या ये नियम संशोधित होंगे या वापस लिए जाएंगे? विनोद पाण्डेय की यह प्रतिक्रिया इस बहस को और गहरा कर रही है, जहां अब सवाल सिर्फ नियमों का नहीं, बल्कि न्याय की आत्मा का है।
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