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फ़िल्म अभिनेता धर्मेंद्र का फिल्मी सफरनामा: एक ही-मैन की कहानी, स्कूल हेड मास्टर का लड़का ऐसे पहुंचा मुम्बई

 

विनोद शर्मा

पंजाब की मिट्टी से निकला एक साधारण लड़का, जिसका नाम था धर्म सिंह देओल, कैसे बॉलीवुड का ‘ही-मैन’ बना और दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया—यह कहानी है धर्मेंद्र की।

8 दिसंबर 1935 को लुधियाना जिले के नसराली गांव में जन्मे धर्मेंद्र का बचपन गांव की गलियों और खेतों में बीता। उनके पिता स्कूल हेडमास्टर थे, और उन्होंने लुधियाना और फगवाड़ा से अपनी पढ़ाई पूरी की। लेकिन किस्मत ने उन्हें मुंबई की चकाचौंध की ओर खींचा। 1950 के दशक में फिल्मफेयर मैगजीन के एक टैलेंट हंट में जीतने के बाद, 19 साल की उम्र में शादी करने वाले इस युवा ने पंजाब छोड़कर बॉलीवुड का रुख किया, जहां उनका इंतजार था सपनों की दुनिया।

धर्मेंद्र का फिल्मी सफर 1960 में शुरू हुआ, जब उन्होंने अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से डेब्यू किया। यह फिल्म ज्यादा कमाल नहीं कर पाई, और शुरुआती सालों में उन्हें छोटी-मोटी भूमिकाओं से गुजरना पड़ा। लेकिन उनकी मेहनत रंग लाई। 1962 की ‘अनपढ़’ और 1963 की ‘बंदिनी’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने दर्शकों का ध्यान खींचा।
फूल और पत्थर से आया ब्रेकथ्रू

असली ब्रेकथ्रू आया 1966 में ‘फूल और पत्थर’ से, जहां मीना कुमारी के साथ उनकी जोड़ी हिट हुई। यह फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई और धर्मेंद्र को पहली बार फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर नॉमिनेशन मिला 1960 के दशक में
उन्होंने ‘आयी मिलन की बेला’ (1964), ‘हकीकत’ (1964), ‘काजल’ (1965), ‘अनुपमा’ (1966), ‘ममता’ (1966), ‘शिकार’ (1968), आँखे’ (1968) और ‘सत्यकाम’ (1969) जैसी हिट फिल्में दीं। इनमें से कई ने उन्हें बहुमुखी अभिनेता के रूप में स्थापित किया कभी रोमांटिक हीरो, कभी एक्शन स्टार।

1970 का दशक धर्मेन्द्र जी का स्वर्णिम काल
1970 का दशक धर्मेंद्र के लिए स्वर्णिम काल था। वे सुपरस्टार बन चुके थे। ‘जीवन मृत्यु’ (1970), ‘मेरा गांव मेरा देश’ (1971)—जिसमें उन्होंने डाकू जसवंत सिंह का किरदार निभाया और दूसरा फिल्मफेयर नॉमिनेशन मिला—’सीता और गीता’ (1972), ‘यादों की बारात’ (1973), ‘जुगनू’ (1973), ‘दोस्त’ (1974), ‘शोले’ (1975) जैसी फिल्मों ने उन्हें अमर बना दिया। ‘शोले’ में अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी ‘जय-वीरू’ आज भी याद की जाती है—यह फिल्म ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर बनी, जिसने 60 गोल्डन जुबली मनाई। 1975 में ही ‘चुपके चुपके’ और ‘प्रतिज्ञा’ ने उन्हें कॉमेडी और एक्शन दोनों में माहिर साबित किया। 1977 में ‘धरम वीर’ और ‘चाचा भतीजा’ ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया।

जब हेमा मालिनी संग की शादी

इस दशक में उन्होंने हेमा मालिनी के साथ कई हिट जोड़ियां बनाईं, जैसे ‘तुम हसीन मैं जवां’ (1970), ‘राजा जानी’ (1972), ‘जुगनू’ (1973), और ‘शोले’। उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री ऑफ-स्क्रीन प्यार में बदल गई, और 1980 में दोनों ने शादी कर ली।

1980 के दशक में भी जलवा रहा

1980 के दशक में भी धर्मेंद्र का जलवा कायम रहा, हालांकि फिल्मों की क्वालिटी थोड़ी गिर गई। ‘राम बलराम’ (1980), ‘कातिलों के कातिल’ (1981), ‘सम्राट’ (1982), ‘नौकर बीवी का’ (1983)—जिसके लिए उन्हें बेस्ट कॉमेडियन नॉमिनेशन मिला—गुलामी’ (1985), ‘हुकुमत’ (1987)—यह साल की सबसे ज्यादा कमाने वाली फिल्म बनी—और ‘लोहा’ (1987) जैसी फिल्मों ने उन्हें एक्शन हीरो के रूप में बनाए रखा। उन्होंने अमिताभ बच्चन, जीतेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती जैसे सितारों के साथ मल्टी-स्टारर फिल्में कीं। लेकिन 1980 के अंत तक, वे बी-ग्रेड एक्शन फिल्मों की ओर मुड़ गए, जो छोटे शहरों और मजदूर वर्ग में पॉपुलर रहीं।

धर्मेंद्र की उपलब्धियां गिनाने लायक हैं। उन्होंने 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, जिनमें 74 हिट्स, 7 ब्लॉकबस्टर और 13 सुपरहिट शामिल हैं—यह हिंदी सिनेमा का रिकॉर्ड है। 1973 में 8 हिट्स और 1987 में 7 लगातार हिट्स का रिकॉर्ड आज भी उनके नाम है।

अवॉर्ड्स में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (1997), पद्म भूषण (2012), और कई नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स शामिल हैं। उन्होंने विजयता फिल्म्स के बैनर तले ‘बेताब’ (1983)—जिससे बेटे सनी देओल लॉन्च हुए—’घायल’ (1990)—जिसने बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर जीता—और ‘बरसात’ (1995)—बेटे बॉबी देओल का डेब्यू—जैसी फिल्में प्रोड्यूस कीं।

1990 के दशक में उनका स्टारडम थोड़ा फीका पड़ा, और वे कैरेक्टर रोल्स में आ गए। ‘क्षत्रिय’ (1993), ‘प्यार किया तो डरना क्या’ (1998) जैसी फिल्में कीं। लेकिन कमबैक 2007 में ‘अपने’ से हुआ, जहां सनी और बॉबी के साथ उन्होंने फैमिली ड्रामा पेश किया। फिर ‘यमला पगला दीवाना’ (2011) और उसके सीक्वल्स ने उन्हें फिर से स्पॉटलाइट में लाया। हाल के सालों में ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ (2023)—जिसने नेशनल अवॉर्ड जीता—’तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ (2024) और वेब सीरीज ‘ताज: डिवाइडेड बाय ब्लड’ (2023) में नजर आए। आने वाली फिल्म ‘इक्किस’ (2025) में भी वे दिखेंगे।

धर्मेंद्र की कहानी संघर्ष, सफलता और परिवार की है। पंजाब के एक गांव से बॉलीवुड के शिखर तक का सफर, जहां उन्होंने न सिर्फ एक्शन और रोमांस किया, बल्कि दर्शकों को इंस्पायर भी किया। आज 89 साल की उम्र में भी, वे सिनेमा के जीवंत हिस्से बने हुए हैं—एक सच्चे ही-मैन की तरह
इस समय फ़िल्म अभिनेता धर्मेन्द्र जी मुम्बई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में आईसीयू में हैं। उनके करोड़ों प्रशंसक को उनके बेहतर स्वास्थ्य होने की प्रार्थना कर रहे हैं।

(नोएडा खबर डॉट कॉम)

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