बरसात में घाघ-घाघनी की भूमिका : प्रकृति के रहस्यमयी जासूस

विनोद शर्मा
(नोएडा खबर डॉट कॉम)
बहुत समय पहले, उत्तर भारत के गाँवों में घाघ और उनकी पत्नी घाघनी (भड्डरी) रहते थे। दोनों प्रकृति के साथ इतने एकाकार थे कि हवा का रुख, पक्षियों की चहचाहट, कीट-पतंगों की हरकत, नक्षत्रों की स्थिति और बादलों का रंग देखकर वे मौसम का सटीक अनुमान लगा लेते। घाघनी अक्सर पूछती, “घाघ, आज आकाश क्या कह रहा है?” घाघ मुस्कुराते हुए जवाब देते, “सुन घाघनी, प्रकृति की किताब खुली है…”

हवा और प्राकृतिक संकेत

पुरवाई (पूर्वी हवा) तेज चलती तो घाघनी चेतावनी देतीं — “खेतों से पुआल-भूसा हटा लो, सोहरा कोण बह रहा है, कीरा (साँप) निकलेंगे और आंधी-बारिश आएगी।”
भुईं लोट बहै पुरवाई, तौ जाना कि बरखा आई।
(पुरवाई अगर धूल उड़ाती जमीन को छूकर बहे तो बारिश निश्चित।)

चींटियाँ अंडे इधर-उधर करतीं, अबाबील गोते लगातीं, गौरैया धूल में नहाती, लाल कीड़ा बिल से बाहर निकलता या उत्तर में बिजली चमकती तो वे तुरंत बता देते — बारिश आने वाली है।

“दिन में गरमी रात में ओस, कहैं घाघ बरखा सौ कोस!”
(बारिश बहुत दूर है।)

नक्षत्रों के अनुसार वर्षा

घाघ-घाघनी नक्षत्रों को मौसम का कैलेंडर मानते थे:

रोहिणी (नौतपा):
“सर्व तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर। परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर।”
जितनी तेज गर्मी (23 मई-5 जून), उतनी भरपूर बारिश।

मृगशिरा:
“तपैं मृगशिरा तलफें चार। बन, बालक, अरू भैंस उखार।”
गर्मी से जंगल, बच्चे, भैंस और गन्ना कष्ट झेलें तो अच्छी बारिश।

आर्द्रा:
हल्की बारिश होनी चाहिए।
“आदि न बरखै अद्दरा हस्त न बरख निदान, कहैं घाघ सुन घाघनी, होय किसान पिसान।”
आदि में आर्द्रा और हस्त के अंत में पानी न बरसे तो किसान पिस जाएगा।

पुनर्वसु:
“पुरवा पुनर्वस भरे न ताल, तौ पुन भरिहै अगले साल।”
तालाब न भरे तो अगले साल भरेंगे।
चित्रा और हस्त:
“बढ़त जो बरसे चित्रा उतरत बरसे हस्त। कितनौ राजा डांड़ ले, हारे नहीं गृहस्थ।”
चित्रा में बढ़ते और हस्त में उतरते समय बारिश अच्छी उपज देती है।
रोहिणी बरसे, मृग तपै, कुछ-कुछ अद्रा जाय: कुत्ते भी भात नहीं खाएँगे (अर्थात इतनी उपज)।

महीनों के संकेत

चैत्र:
“एक बूँद जौं चइत म परै। सहस बूँद सावन में हरै।”
“चइत कै पछुआ भादों जला। भादों पछुआ माघ म पला।”
जेठ: पुरवाई चली तो सावन सूखा। अच्छी गर्मी पड़ी तो वर्षा ऋतु अच्छी। मेंढक बोले तो बारिश जल्दी।
आषाढ़: पूर्णिमा को चाँद बादलों में छुपा तो खुशहाली।
“आषाढ़ी पूनौ दिना गाज बीज बसंत, ऐसा बोले भड्डरी, आनंद मानो संत।”
सावन: शुक्ल सप्तमी को सूर्य छुपा तो देव उठनी तक बारिश। सूर्य निकला या आधी रात गरज-बारिश हुई तो सूखा।
माघ:
“माघ गरगरी जेठ का जाड़। नदी नार बहि चलै असाढ़। अस बोले भड्डर कै जोय। आसौं बरसा धौं कस होय।”
लाल बादल = ओले। शुक्ल अष्टमी को गरज = एक महीने बारिश।
भादों: अनुराधा चाँदनी = अच्छी फसल।

अन्य महत्वपूर्ण कहावतें“

पहला पानी भरिगै ताल, अब काव कही बरखा कै हाल। घाघ कहैं हम होबै जोगी, कुआं के पानी से धोइहैं धोबी।”
(पहली बारिश में ताल भर गए तो सूखा पड़ेगा।)
“माघ पूष जो दखिन चले, तो सावन के लच्छन भले।”
“भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय। ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।”
“दिन का बद्दर रात निबद्दर, बहै पुरवैया भव्बर भव्बर। घाघ कहैं कुछ होनी होई।”
“उत्तरा उतर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।”
“आवत ना आदर दियो जात न दीनी हस्त। ये दोनों पछितायेंगे पाहुन और गृहस्थ।”

घाघनी का प्रसिद्ध दोहा“

शुक्रवार की बादरी, रहे शनिश्चर छाय।
घाघ कहे सुन घाघनी, बिन बरसे नहीं जाय!!”
आज का संदेश
घाघ-घाघनी की ये कहावतें सदियों से किसानों का मार्गदर्शन करती रही हैं। आज हम स्मार्टफोन और ऐप्स पर निर्भर हैं, लेकिन वे हवा, तारे, चींटी, पक्षी और नक्षत्रों से सीधा संवाद करते थे। गांवों में दादी आज भी वही परंपरा जीवित रखे हुए हैं। जब गाँव जाता हूँ, तो पक्षियों की कूक, मोर की आवाज और हवा का रुख मुझे घाघ-घाघनी की याद दिलाता है।प्रकृति से जुड़ो, उसके संकेत पढ़ो — घाघ-घाघनी का ज्ञान आज भी जिंदा है!
जय हो इस लोक-ज्ञान की! ये कहावतें घाघ-भड्डरी की लोक परंपरा का हिस्सा हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं। इन्हें अपनाकर हम प्रकृति के साथ फिर से तालमेल बिठा सकते हैं।

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