विनोद शर्मा
(नोएडा खबर डॉट कॉम)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जनवरी 2026 की शुरुआत में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिल्ली यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा के निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और कार्यवाहक अध्यक्ष नबीन प्रधान से मुलाकात ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।
दिसंबर 2025 के अंत में हुई भाजपा कोर कमेटी की बैठक और खरमास (14 जनवरी 2026 तक) के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की सुगबुगाहट के संदर्भ में इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह मुलाकात संभावित कैबिनेट विस्तार, संगठनात्मक बदलाव और 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी से जुड़ी बताई जा रही है।
वर्तमान स्थिति
उत्तर प्रदेश में योगी मंत्रिमंडल में वर्तमान में 54 मंत्री हैं, जबकि संवैधानिक सीमा 60 है। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद जितिन प्रसाद और अनूप प्रधान जैसे मंत्री सांसद बन गए, जिससे कुछ महत्वपूर्ण विभाग (जैसे पीडब्ल्यूडी) मुख्यमंत्री के पास ही हैं।
दिसंबर 2025 में लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास पर हुई भाजपा कोर कमेटी बैठक में संभावित नए मंत्रियों के नामों पर चर्चा हुई थी। निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को कैबिनेट में बड़ी जिम्मेदारी मिलने की अटकलें हैं।
खरमास समाप्त होने के बाद (जनवरी 2026 मध्य से) मंत्रिमंडल में 5-6 नए चेहरों को शामिल करने और कुछ पुराने मंत्रियों के विभाग बदलने की तैयारी है। यह विस्तार जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और संगठन-सरकार के बीच तालमेल को मजबूत करने के लिए देखा जा रहा है।
मुलाकात के राजनीतिक मायने
केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी और समन्वय:
भाजपा में बड़े राज्यों के मंत्रिमंडल विस्तार के लिए मुख्यमंत्री को पीएम और पार्टी अध्यक्ष से हरी झंडी लेनी पड़ती है। ऐसी मुलाकातें अक्सर नामों के फाइनलाइजेशन और जातीय-अनुपात को संतुलित करने के लिए होती हैं।
यह मुलाकात योगी की स्थिति को मजबूत करने का संकेत देती है, क्योंकि 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम होने के बावजूद योगी पर केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा कायम है।
2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी:
2026 को भाजपा “मिशन 2027” का आधार वर्ष मान रही है। मंत्रिमंडल विस्तार से पिछड़े, दलित, ओबीसी और क्षेत्रीय असंतोष को दूर करने की कोशिश होगी।
नए चेहरों को शामिल कर पार्टी युवा और सक्रिय नेताओं को प्रोत्साहन देगी, जबकि कुछ मंत्रियों को संगठन में भेजकर चुनावी मैदान मजबूत किया जाएगा।
जातीय और क्षेत्रीय संतुलन:
यूपी में जाट , गुर्जर, ब्राह्मण, दलित और गैर-यादव ओबीसी वोट महत्वपूर्ण हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को मंत्री बनाने से पश्चिमी यूपी मजबूत होगा।
अवध और पूर्वांचल से नए चेहरों को जगह मिल सकती है, ताकि 2024 के नुकसान की भरपाई हो।
संगठन और सरकार के बीच तालमेल:नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की नियुक्ति के बाद संगठन में बदलाव के साथ कैबिनेट विस्तार से “एक व्यक्ति, एक पद” के सिद्धांत को लागू किया जाएगा।
यह कदम पार्टी में आंतरिक कलह को कम करने और डबल इंजन सरकार की छवि को चमकाने का प्रयास है।
विपक्ष पर प्रभाव:समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल इसे “आंतरिक कलह” का संकेत बता सकते हैं, लेकिन भाजपा इसे चुनावी रणनीति के रूप में पेश करेगी।
यदि विस्तार सफल होता है, तो यह योगी सरकार की स्थिरता और विकास एजेंडे को मजबूती देगा।
योगी आदित्यनाथ की पीएम मोदी और जेपी नड्डा से संभावित मुलाकात मंत्रिमंडल विस्तार की अंतिम औपचारिकता है, जो जनवरी 2026 के मध्य में हो सकता है। यह कदम न केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ाएगा, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले भाजपा की सामाजिक आधार को व्यापक बनाएगा। यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्य में ऐसे बदलाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डालते हैं, क्योंकि यहां की जीत भाजपा के लिए केंद्रीय सत्ता की कुंजी है। यदि यह विस्तार जातीय समीकरण साधने में सफल होता है, तो यह योगी की नेतृत्व क्षमता को और मजबूत करेगा।
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